जयपुर के आधा दर्जन बड़े निजी अस्पतालों में मेडिकल इंश्योरेंस 'लाइलाज'

सीके बिडला, ईएचसीसी हॉस्पिटल, फोर्टिस, मणिपाल, नारायणा हॉस्पिटल और संतोकबा दुर्लभजी अस्पताल, शहर के बड़े अस्पतालों में इनका नाम आता है और सैंकड़ों लोग यहां इलाज के लिए आते हैं लेकिन कैशलैस सुविधा बंद होने से लोग परेशान हो रहे हैं.

जयपुर के आधा दर्जन बड़े निजी अस्पतालों में मेडिकल इंश्योरेंस 'लाइलाज'
आधा दर्जन अस्पतालों में कैशलैस उपचार बंद कर दिया गया है.

जयपुर: राजधानी के आधा दर्जन बड़े निजी अस्पतालों में मेडिकल इंश्योरेंस 'लाइलाज' साबित हो रहा है यानी यदि आपने कैशलैस मेडिकल इंश्योरेंस ले रखा है तो भी इन अस्पतालों में इंश्योरेंसधारी मरीज को इलाज के लिए पहले जेब ढीली करनी पड़ेगी. 

ये कोई हमारे आरोप नहीं बल्कि चार इंश्योरेंस कंपनियों और निजी अस्पतालों के बीच चल रहे प्रोसीजर चार्ज और क्लेम की खींचतान का विवाद है, जिसका खामियाजा हजारों की संख्या में मरीज उठा रहे हैं.

एक बड़े निजी अस्पताल में इस भरोसे इलाज के लिए एक मरीज पहुंचा कि उसको कैशलेस ट्रीटमेंट मिलेगा. ये मरीज पिछले 15 साल से कैशलैस मेडिकल इंश्योरेंस की किस्त भर रहा था लेकिन जब वे अस्पताल पहुंचे तो उन्हें पता चला कि कैशलेस ट्रीटमेंट नहीं मिलेगा. मजबूरन अस्पताल में पैसा देकर इलाज करवाया. 

पिछले कुछ दिनों से राजधानी जयपुर के निजी अस्पतालों में उपचार कराने पहुंच रहे मेडिकल इंश्योरेंसधारी मरीज कुछ इसी तरह खुद को ठगा सा महसूस कर रहे है. इसके पीछे की वजह है कि चार बड़ी इंश्योरेंस कंपनी और अस्पतालों के बीच का विवाद. इसके चलते आधा दर्जन अस्पतालों में कैशलैस उपचार बंद कर दिया गया है.

इन कंपनियों के इंश्योरेंसधारी की मुसीबतें -
ओरिएंटल, न्यू इंडिया इंश्योरेंस, नेशनल इंश्योरेंस कंपनी और यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी.

इन निजी अस्पतालों ने बंद किया कैशलैस उपचार
सीके बिडला, ईएचसीसी हॉस्पिटल, फोर्टिस, मणिपाल, नारायणा हॉस्पिटल और संतोकबा दुर्लभजी अस्पताल, शहर के बड़े अस्पतालों में इनका नाम आता है और सैंकड़ों लोग यहां इलाज के लिए आते हैं लेकिन कैशलैस सुविधा बंद होने से लोग परेशान हो रहे हैं.

दरअसल, अस्पताल कहते हैं कि इंश्योरेंस कंपनियां जो प्रोसीजर चार्ज दे रही है, वे काफी पुराने हैं. इन्हें रिव्यू किया जाना चाहिए. वर्ष 2010-2011 के बाद से नियम बदले ही नहीं गए. वहीं दूसरी ओर कंपनियां इस पर अड़ी हैं कि जिन शर्तों के तहत क्लेम दिया जाना तय हुआ था, वे वही देंगी. अस्पतालों के लिए अब नियम बदले जाना संभव नहीं है. कंपनी और अस्पताल के अधिकारियों की कई बार की बैठकों के बाद भी बात नहीं बनी तो अस्पतालों ने इन कंपनियों के कैशलैस इंश्योरेंस पर इलाज करना ही बंद कर दिया अब बगैर कैशलैस इलाज से मरीजों को क्या है दिक्कतें, आइए हम आपको बताते हैं-

अस्पताल के बिल और कंपनी की ओर से दिए जाने वाले पैसे में 20 से 25 फीसदी का अंतर आ जाता है यानी कि यदि एक लाख रुपये का इलाज हुआ तो 20 हजार रुपये तक मेरे लग रहे हैं. इसके अलावा इंश्योरेंस के वे पहले ही दे चुके हैं. 
अस्पतालों का तर्क है कि वर्ष 2010-2011 के प्रोसेजर चार्ज से ही कंपनियां पैसा दे रही हैं जबकि अब कई नई तकनीक और महंगी मशीनों से इलाज किया जाता है. ऐसे में वे जो पैसा दे रही हैं, उसके हिसाब से खर्च निकालना मुश्किल है. कई सर्जरी तो ऐसी हैं, जिनकी तकनीक और मशीनें ही करोड़ों रुपये की हैं, ऐसे में वे पुराने प्रोसेजर चार्ज के हिसाब से पैसा नहीं ले सकते.