चौमूं: पुलवामा शहीद रोहिताश लांबा की शहादत को भुला बैठी सरकार, परिजनों को मदद का इंतजार

शहीद की वीरांगना मंजू देवी कहती हैं कि वह सैनिक कल्याण विभाग के चक्कर पर चक्कर लगाकर थक चुकी हैं लेकिन अभी तक उनके देवर को नौकरी नहीं दी गई. 

चौमूं: पुलवामा शहीद रोहिताश लांबा की शहादत को भुला बैठी सरकार, परिजनों को मदद का इंतजार
शहीद स्मारक के नाम का बजट भी अभी तक स्वीकृत नहीं हुआ है.

प्रदीप सोनी, चौमूं: जम्‍मू-कश्‍मीर के पुलवामा में 14 फरवरी 2019 को हुए आतंकी हमले में भारत के 40 जांबाज जवान देश के लिए शहीद हो गए थे. प्रदेश के पांच शहीदों में जयपुर के अमरसर थाना इलाके के गोविंदपुरा बासड़ी गांव के रोहिताश लांबा भी इन शहीदों में एक थे. 

इन जवान शहीदों की शहादत को कभी भुलाया नहीं जाएगा. वहीं, सरकार इस शहीद की शहादत को भुला बैठी है. सरकार द्वारा की गई घोषणा महज घोषणाएं होकर रह गईं. न स्कूल का नामकरण शहीद के नाम पर हुआ और न शहीद के परिजन को नौकरी मिली.

वो भूले घर परिवार को, सांसों पर लिखा था दुश्मन की गोली का नाम, लिखी थी प्रियतमा को चिट्ठी, घर आऊंगा जल्दी, ऊपर लिखा था शहीद रोहिताश का नाम, खोली प्रियतमा ने चिट्ठी, लिखा था शहीद हो गए रोहिताश लांबा, कर गए देश में अपना नाम, देश हमारा, सरहद हमारी, जर्रा जर्रा कहता है रोहिताश तुझे सलाम... जब तिरगें में लिपटा रोहिताश का पार्थिव शरीर उसके घर पहुंचा था तो कुछ ये पक्तियां लिखी गई थीं. 

पत्नी ने रोते हुए शहीद पति को किया याद
इन पंक्तियों के जरिये फिर आज शहीद रोहिताश लांबा की याद आ रही है. जब देश का जाबाज जवान देश के लिए अपनी कुर्बानी देता है और फिर उस वीर सपूत का पार्थिव देह तिरंगे में लिपट कर घर आता है. तिरंगे में लिपटे शव को देखकर गांव, गली, घर, हर जगह कोहराम मच जाता है. पुलवामा अटैक के दौरान शहीद हुए रोहिताश लांबा की वीरांगना मंजू देवी अपने पति को कुछ ऐसे ही शब्दों में याद करते करते रोने लगती है. कहती हैं कि सात जन्म में भी मुझे ऐसा पति नहीं मिल पाएगा.

बस पर आत्‍मघाती आतंकी हमला 14 फरवरी 2019 को हुआ
यादे हैं जयपुर जिले के अमरसर थाना इलाके के गोविंदपुरा गांव की. इसी गांव के रोहिताश लांबा भी सीआपीएफ में जम्‍मू कश्‍मीर में तैनात थे, जहां सीआपीएफ के जवानों से भरी बस पर आत्‍मघाती आतंकी हमला 14 फरवरी 2019 को हुआ. इस हमले में राहिताश लांबा शहीद हो गये थे. पुलवामा आतंकी हमले में में शहीद हुए रोहिताश लांबा का जन्म 14 जून 1991 को गोविंदपुर बासड़ी गांव में हुआ था. 

शहीद की शहादत को कोई भुला नहीं सकता 
रोहिताश लांबा 2011 में सीआरपीएफ में भर्ती हुए थे. वर्ष 2013 में प्रशिक्षण के बाद ड्यूटी ज्वाइन की. रोहिताश के एक साल बेटा ध्रुव है. एक भाई जितेंद्र कुमार है और बूढ़े मां बाप हैं, जिनकी सेवा जितेंद्र कुमार और वीरांगना मंजू देवी करती है. शहीद की शहादत को कोई भुला नहीं सकता लेकिन शहीद परिवार के दर्द को जानकर लगता है कि सरकार शहीद की शहादत को भुला बैठी है. शहीद के भाई जितेंद्र कुमार बताते हैं कि भाई को खूब मान मिला, सम्मान मिला लेकिन सरकार उनके सम्मान को अब भूल गई है. शहीद होने के 1 साल बाद भी शहीद के नाम पर स्कूल का नामकरण नहीं हुआ है. इसको लेकर कई चक्कर लगा चुके हैं.

परिजनों से किए गए झूठे वादे
शहीद के परिजनों को आर्थिक मदद के तौर पर प्रदेश सरकार ने 50 लाख रुपये का पैकेज दिया था तो वहीं केंद्र सरकार ने 80 लाख रुपये देकर आर्थिक सहायता की थी. वहीं, भामाशाहों ने भी शहीद परिवार की बढ़-चढ़कर मदद की थी. शहीद की अंतिम यात्रा मे कई मंत्री, नेता, अधिकारी पहुंचे थे. उस समय की गई घोषणाओं को 1 साल गुजर गया लेकिन अब तक ये घोषणाएं पूरी नहीं है. शहीद के पिता बाबूलाल बताते हैं कि न तो अब तक स्कूल का नामकरण शहीद के नाम पर हुआ और न ही उनके बेटे को सरकारी नौकरी मिली है.

इतना ही नहीं, शहीद स्मारक के नाम का बजट भी अभी तक स्वीकृत नहीं हुआ है. शहीद की वीरांगना मंजू देवी कहती हैं कि वह सैनिक कल्याण विभाग के चक्कर पर चक्कर लगाकर थक चुकी हैं लेकिन अभी तक उनके देवर को नौकरी नहीं दी गई. स्कूल का नामकरण शहीद के नाम पर नहीं होने और देवर को नौकरी नहीं मिलने के कारण से शहीद के परिजनों ने सरकार के प्रति नाराजगी जताई है. नाराज शहीद की वीरांगना मंजू देवी और भाई जितेंद्र ने प्रदेश सरकार से मिली 50 लाख रुपये के आर्थिक सहायता पैकेज को लौटाने का ऐलान कर दिया है.

जहां देश की सुरक्षा के लिए न्यौछावर एक बेटे, एक पति का शरीर तिरंगे में लिपटे हुए आता है तो हर देखने वाली आंख नम हो जाती हैं. पिता अपने जिगर के टुकड़े को खो देता है, मां की गोद सूनी हो जाती है, बहन का भाई दुनिया को छोड़ जाता है, पत्नी का सिंदूर उजड़ जाता है, रोहिताश लांबा की शहादत को 1 साल होने जा रहा है. अब उम्मीद करनी चाहिए कि सरकार शहीद परिवार की पीड़ा को समझ कर सरकारी स्कूल का नामकरण शहीद के नाम पर करें और शहीद स्मारक का काम भी पूरा कराएं.