जयपुर: 15 सालों से संस्कृत कॉलेजों में खाली पड़े हैं शिक्षकों के पद, जो हैं, उन्हें प्रमोशन नहीं

बीते 15 सालों से संस्कृत (Sanskrit) कॉलेजों में न तो शिक्षकों की नियुक्ति हुई है और न ही पदोन्नति, जिसके चलते अब संस्कृत (Sanskrit) शिक्षा के हाल बेहाल होते हुए नजर आ रहे हैं. 

जयपुर: 15 सालों से संस्कृत कॉलेजों में खाली पड़े हैं शिक्षकों के पद, जो हैं, उन्हें प्रमोशन नहीं
यूजीसी के नियमों में बदलाव के साथ ही संस्कृत (Sanskrit) शिक्षा में डीसीपी का प्रावधान बंद हो गया.

ललित कुमार, जयपुर: संस्कृत (Sanskrit) को बढ़ावा देने के बड़े-बड़े दावे चाहे कागजों पर किए जाते हैं लेकिन धरातल पर ये सभी दावे हवा होते हुए नजर आ रहे हैं. पिछले 15 सालों से संस्कृत (Sanskrit) कॉलेजों में शिक्षकों की भर्ती नहीं होने की वजह से करीब 50 फीसदी पद खाली हैं.

बीते 15 सालों से संस्कृत (Sanskrit) कॉलेजों में न तो शिक्षकों की नियुक्ति हुई है और न ही पदोन्नति, जिसके चलते अब संस्कृत (Sanskrit) शिक्षा के हाल बेहाल होते हुए नजर आ रहे हैं. 

स्कूल शिक्षा में संस्कृत (Sanskrit) की बात की जाए तो सरकार इस ओर युद्ध स्तर पर ध्यान दे रही है लेकिन जब बाद आती है कॉलेज संस्कृत (Sanskrit) शिक्षा की तो हवाएं कुछ और ही बयां करती हैं. प्रदेश में करीब दो दर्जन से ज्यादा संस्कृत (Sanskrit) कॉलेज संचालित हो रहे हैं लेकिन इन कॉलेजों में शिक्षकों के करीब 60 फीसदी से ज्यादा शिक्षकों के पद खाली पड़े हैं. इसके चलते न सिर्फ विद्यार्थियों को कॉलेजों से मोह भंग हो रहा है, साथ ही शिक्षकों की समस्याएं भी विकराल रूप धारण करती जा रही हैं.

डीपीसी के माध्यम से भरे जाते थे शिक्षकों के पद
साल 2005 से पहले तक स्कूल शिक्षा के आधार पर ही डीपीसी के माध्यम से संस्कृत (Sanskrit) कॉलेजों में शिक्षकों के पद भरे जाते थे लेकिन यूजीसी के नियमों में बदलाव के साथ ही संस्कृत (Sanskrit) शिक्षा में डीसीपी का प्रावधान बंद हो गया. इसके बाद संस्कृत कॉलेजों में डायरेक्ट पदों को भरने का नियम लागू हुआ लेकिन 15 सालों से संस्कृत (Sanskrit) कॉलेजों में डायरेक्ट पद भी नहीं भरे गए. इसके चलते संस्कृत (Sanskrit) कॉलेजों के हाल बेहाल हो रहे हैं.

कॉलेजो में तो महज 1-2 शिक्षक ही बचे 
संस्कृत (Sanskrit) कॉलेज के शिक्षक कमल शर्मा का कहना है कि 2005 में डीपीसी पर रोक लगाई और डायरेक्टर पद भरने के नियम लागू हुआ लेकिन 15 सालो में डायरेक्ट पद भी नहीं भरे गए. इसके चलते संस्कृत (Sanskrit) कॉलेजों में करीब 50 फीसदी से ज्यादा पद खाली हो गए हैं. प्रदेश के कई कॉलेजो में तो महज 1-2 शिक्षक ही बचे हैं जबकि प्रदेश में संस्कृत (Sanskrit) कॉलेजों में करीब 180 से ज्यादा पद स्वीकृत हैं जबकि कार्यरत करीब 70 शिक्षक ही हैं. संस्कृत (Sanskrit) स्कूलों में जहां 2015 में ही नियम लागू हो चुके हैं तो वहीं पदोन्नति भी स्कूलों में शिक्षकों को समय पर मिलती है लेकिन कॉलेजों में 15 सालों से कोई पदोन्नति भी नहीं हो पाई है, जिसके कारण समस्या बढ़ती ही जा रही है.

ये कहना है संस्कृत शिक्षा विभाग का
दूसरी ओर अगर संस्कृत (Sanskrit) शिक्षा विभाग की मानें तो 15 सालों से चली आ रही समस्या बहुत जल्द ही दूर होने वाली है क्योंकि शिक्षकों की भर्ती को लेकर डीओपी और फाइनेंस विभाग की ओर से अंतिम मंजूरी मिल चुकी है. कॉलेज आयुक्त प्रदीप कुमार बोरड़ का कहना है कि संस्कृत (Sanskrit) शिक्षा में किए गए बदलाव के नियम काफी कठिन होने की वजह से समस्या हो रही है. पिछली कांग्रेस सरकार के दौरान भी नियम बने लेकिन वो कानूनी पचड़े में फंसने की वजह से लागू नहीं हो पाए थे, जिसके बाद नए नियमों को लेकर कवायद शुरू की गई और अब जल्द ही उनको लागू होने की हरी झंडी मिलेगी. इसके साथ ही पदों को भरने और पदोन्नति का रास्ता भी साफ हो जाएगा.

बहरहाल, उच्च शिक्षा विभाग की ओर से पिछले 4 सालों से समस्याओं के समाधान का बड़े बड़े दावे किए जाते हैं लेकिन हर बार ये दावे सिर्फ कागजों तक ही सीमित रह जाते हैं. ऐसे में कॉलेज स्तर पर दम तोड़ती संस्कृत (Sanskrit) शिक्षा को आखिर संजीवन मिलती है या नहीं ये तो वक्त ही बताएगा.