नेत्रदान में पिछड़ी शिक्षा नगरी कोटा, 9 साल में हुए केवल 440 नेत्रदान

कोटा संभाग में 9 साल में केवल 440 नेत्रदान हो हुए हैं, जिनमें शिक्षा नगरी कोटा में 381 नेत्रदान शामिल हैं. कोटा संभाग में शाइन इंडिया नाम की संस्था साल 2011 से नेत्रदान ले रही है.

नेत्रदान में पिछड़ी शिक्षा नगरी कोटा, 9 साल में हुए केवल 440 नेत्रदान
प्रतीकात्मक तस्वीर.

मुकेश सोनी, कोटा: पूरे विश्व सहित देशभर में ऑर्गन डोनेशन के प्रति लोगों की सोच बदल रही है. खासकर 'आई डोनेशन' के मामले में यह ज्यादा पॉजिटिव नजर आ रही है लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि शिक्षा नगरी के रूप में पहचान बना चुके कोटा नेत्रदान में पिछड़ा हुआ है. 

कोटा संभाग में 9 साल में केवल 440 नेत्रदान हो हुए हैं, जिनमें शिक्षा नगरी कोटा में 381 नेत्रदान शामिल हैं. कोटा संभाग में शाइन इंडिया नाम की संस्था साल 2011 से नेत्रदान ले रही है. कोटा में नेत्रदान का प्रतिशत 7 फीसदी के आंकड़े को पार नहीं कर पाया है. जबकि जयपुर, अजमेर में नेत्रदान का प्रतिशत अधिक है.

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सरकारी स्तर पर प्रयासों में कमी
कोटा में मेडिकल कॉलेज से संबद्ध तीन बड़े अस्पताल हैं, जहां परम विशेषज्ञ चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध हैं लेकिन यहां नेत्रदान की सुविधा नहीं है. नेत्रदान के महत्व को देखते हुए हर साल 10 जून को विश्व नेत्रदान दिवस मनाया जाता हैं. कोटा में भी इस दिन नेत्रदान करने के लिए लोगों को जागरूक किया जाता हैं. समय-समय पर मेडिकल कॉलेज प्रशासन की ओर से नेत्रदान को लेकर सेमिनार भी आयोजित की जाती है लेकिन सरकारी स्तर पर 'कार्निया री ट्राईवल' सेंटर स्थापित करने के प्रयास नहीं किए गए. नेत्रदान को लेकर सरकारी स्तर पर किए जाने वाले प्रयास जागरूकता तक ही सीमित रह कर सिमट जाते हैं. 

संस्था के प्रयासों से बढ़ी जागरूकता
शाइन इंडिया संस्था के संस्थापक डॉ. कुलवंत गौड़ के मुताबिक, नेत्रदान करने वालो में ज्यादातर 25 से 55 उम्र के लोग शामिल हैं. कोटा संभाग से हुए नेत्रदान से अबतक 600 लोग दुनिया देख रहे हैं यानी उनकी आंखों की रोशनी लौटी है. नेत्रदान के प्रति लोगों में धीरे-धीरे जागरूकता बढ़ी है. यही कारण है की कोटा संभाग में 10 हजार लोग नेत्रदान का संकल्प पत्र भर चुके हैं. फिलहाल कोटा संभाग में प्रतिमाह 7 नेत्रदान हो रहे हैं. नेत्रदान को लेकर संस्था के पास हर महीने में 30 से 35 कॉल आते हैं. 

नेत्रदान का मतलब समझने की जरूरत
आमतौर पर लोगो की धारणा है कि नेत्रदान के समय उनकी आंखें बाहर निकाली जाती हैं. इस कारण लोग नेत्रदान करने से कतराते हैं जबकि ऐसा नहीं है. नेत्रदान में केवल आंखों का कार्निया (पुतली) निकाला जाता है, पूरी आंख नहीं. आंख में न गड्ढा होता है, न ही खून निकलता, आंख वैसी की वैसी रहती है. एक कार्निया, अधिकतम दो लोगों को ट्रांसप्लांट किया जा सकता है. जानकारी के मुताबिक, 70 प्रतिशत कार्निया ट्रांसप्लांट होता है. 30 प्रतिशत कार्निया चिकित्सक कारणों से संक्रमित पाया जाता है. 

क्या होता है कार्निया?
यह आंख का लगभग दो-तिहाई भाग होता है, जिसमें बाहरी आंख का रंगहीन भाग, लेंस का प्रकाश देने वाला हिस्सा होते हैं. कॉर्निया में कोई रक्त वाहिका नहीं होती बल्कि इसमें तंत्रिकाओं का एक जाल होता है. इसको पोषण देने वाले द्रव्य वही होते हैं, जो आंसू और आंख के अन्य पारदर्शी द्रव का निर्माण करते हैं. नेत्रदान के समय इसी कॉर्निया को निकाला जाता है. आई बैंक में दान किए गए नेत्र को 5 दिन तक ही रखा जा सकता है. इस समय इनका ट्रांसप्लांट होना जरूरी है अन्यथा किसी के दान किए गए नेत्र खराब हो सकते हैं.

नेत्रदान की शपथ कौन ले सकता है?
जानकारी के मुताबिक 2 से 80 साल तक की उम्र का कोई भी व्यक्ति चाहे वह पुरुष है या स्त्री, गरीब है या अमीर, किसी भी धर्म या जाति का हो, नेत्रदान की शपथ ले सकता है. 

ये नहीं कर सकते नेत्रदान
अगर कोई व्यक्ति मृत्यु पूर्व डेंगू, चिकनगुनिया, पीलिया, मलेरिया, टीबी, एचआईवी पॉजिटिव (एड्स) और हेपेटाइटिस बी या सी, ब्लड कैंसर, सैप्टीसिमिया से पीड़ित हो या 48 से 72 घंटे वेंटीलेटर पर हों, तो उनकी आंखें दान नहीं की जा सकती हैं.