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जोधपुर में रंग लाई प्रशासन की मुहिम, जनता को मिला जलसंकट से छुटकारा

सरहदी इलाको में बेरियों के जीर्णोद्धार से जल संरक्षण का सपना साकार होने लगा है. बेरियो में मीठे पानी की आवक शुरू होने के बाद ग्रामीण बेहद खुश हैं.

जोधपुर में रंग लाई प्रशासन की मुहिम, जनता को मिला जलसंकट से छुटकारा
इन बेरिया से एक घंटे मे 50 से अधिक महिलाएं पानी भरकर ले जाती है.

भूपेश आचार्य/बाड़मेर: पानी की एक-एक बूंद को तरसने वाले रेगिस्तान में इन दिनों बाड़मेर की प्रशासन ने पानी की समस्या से छुटकारा पाने के लिए ऐसी मुहिम चलाई जिसमें धरती से अमृत निकलना शुरू हो गया. आलम यह है कि बॉर्डर के इलाकों के लोगों का खुशी का कोई ठिकाना नहीं है. दरअसल बाड़मेर प्रशासन ने बॉर्डर के इलाकों में पानी की समस्या का समाधान करने के लिए पुरानी परंपरागत जल स्रोतों को फिर से शुरू कराने की योजना बनाई इसके लिए प्रशासन ने कुछ जगहों पर पानी की बेड़ियां जो कि पिछले 40-50 सालों से बंद पड़ी थी. उनको वापस साफ सफाई करवाकर शुरू करवाया तो वहां से अमृत निकलने लग गया और मीठा पानी मिलने से गांव के लोगों की खुशी का ठिकाना नहीं है. 

सरहदी इलाको में बेरियों के जीर्णोद्धार से जल संरक्षण का सपना साकार होने लगा है. बेरियो में मीठे पानी की आवक शुरू होने के बाद ग्रामीण बेहद खुश हैं. अधिकतर सरहदी इलाकों को भूमिगत पानी खारा है. ऐसे में अब इनके लिए बेरियां वरदान साबित हो रही है. जिला कलक्टर हिमांशु गुप्ता जब प्रशासनिक अधिकारियों के साथ बेरियो का अवलोकन करने पहुंचे, तो ग्रामीणो ने उनका आभार जताते हुए कहा कि यह बेरियां उनके लिए किसी वरदान से कम नहीं है. बाड़मेर जिले में करीब 1700 बेरियो को चिन्हित करने के साथ इसके जीर्णोद्धार का बीड़ा उठाया गया है. पायलट प्रोजेक्ट के तहत रामसर का पार, सज्जन का पार, बबुगुलेरिया समेत अन्य सरहदी इलाको में मनरेगा के तहत बेरियो में से गाद निकालने के अलावा उसके चारों ओर पक्का स्ट्रक्चर बनाया जा रहा है. इसके सकारात्मक परिणाम सामने आए है. 

रामसर पार में स्थित 30 से अधिक बेरियो का जीर्णोद्धार चल रहा है. कई बेरियो में गाद निकालने के साथ पक्का स्ट्रक्चर बनाया जा चुका है. इनमें कई ऐसी भी बेरियां है जिनमें गाद निकालने के बाद पानी की आवक शुरू हो चुकी है. ऐसा ही कुछ सज्जन का पार एवं अन्य गांवो में हुआ है. ग्रामीणों ने जिला प्रशासन की इस अनूठी पहल की सराहना करते हुए कहा कि इससे उनको खासी राहत मिली है. उन्होंने अन्य गांव में भी बेरिया के जीर्णोंद्धार करवाने की जरूरत जताई. रामसर एवं सज्जन का पार में महिलाओं ने बताया कि इन बेरिया से एक घंटे मे 50 से अधिक महिलाएं पानी भरकर ले जाती है. इसके अलावा ग्रामीण अपने परंपरागत साधना के जरिए भी पानी लेकर जाते है. बारिश होने के बाद बेरिया मैं भी जल का स्तर बढ़ जाएगा. 

बेरियो के जीर्णोद्धार एवं उसमें से गाद निकालने का कार्य हर किसी के बस का नहीं है. सरहदी इलाकों में परंपरागत रूप से कुछ लोग यह काम करते है. यह नई बेरियो के निर्माण से लेकर उसमें गाद निकालने का कार्य करते है. बेरियो का मुंह काफी सकड़ा होता है, ऐसे में रस्सी की मदद से एक व्यक्ति ही इसमें नीचे उतर सकता है. सज्जन का पार में जीर्णोंद्धार के कार्य में लगे कारीगर मठार खान ने बताया कि वह 15 साल से यह काम कर रहा है. ग्रामीण इसको लेकर बेहद खुश है. विशेशकर महिलाएं अपने घर से कुछ दूरी पर बेरियो में मीठे पानी की आवक शुरू होने से बेहद उत्साहित है. 

सरहदी बाड़मेर जिले में आमतौर पर अकाल की स्थिति एवं पेयजल संकट रोजमर्रा की बात रही है. सदियों से पेयजल जुटाने के लिए ग्रामीण अपने स्तर पर पेयजल प्रबंधन के प्रयास करते रहे है. कमोबेश ऐसे ही रेतीले धोरो के पास स्थित समतल भूमि पर ग्रामीणों ने अपने परंपरागत ज्ञान का इस्तेमाल करते हुए बेरियो को निर्माण किया. इसको छोटी कुंईया भी कहा जाता है.

इसमें भूमिगत जल के बजाय साइड से रिसकर अर्थात सेजे का पानी का एकत्रित होता है. बाड़मेर जिले के सरहदी इलाको में बहुतायत से इनका निर्माण हुआ. इसमें व्यक्तिगत एवं सार्वजनिक बेरियो का निर्माण हुआ. शुरूआती दौर में काफी अच्छा चला, लेकिन समय के साथ रेतीली आंधियो एवं देखरेख के अभाव में कई बेरिया रेत से अट गई तो कई बेरियो में गाद जमा होने से पानी की आवक बंद हो गई.