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कावड़ियों से मारपीट मामले में पुलिस अवसर को किया एपीओ, लोगों ने किया फैसले का विरोध

आंदोलनकारियों ने पुलिस के लाठीचार्ज को गलत बताते हुए मसले को गृहमंत्री तक पहुंचाया. कई बार कलेक्टर और संभागीय आयुक्त के बीच वार्ता हुई, लेकिन बात नहीं बनी.

कावड़ियों से मारपीट मामले में पुलिस अवसर को किया एपीओ, लोगों ने किया फैसले का विरोध

फतेहपुर: शेखावाटी की पहचान वीरों की धरा के तौर पर होती है, लेकिन इन दिनों ये जगह धरना प्रदर्शन के चलते सुर्खियों में है. मामले में दो गुटों के बीच पुलिस उपाधीक्षक महमूद खान को एपीओ किए जाने को लेकर अलग-अलग राय नजर आ रही है. दरअसल 19 अगस्त की रात फतेहपुर में कावड़ियों से मारपीट के बाद फैले साम्प्रदायिक तनाव को पुलिस और आम लोगों ने सूझबूझ के साथ को संभाल लिया था. लेकिन दूसरे दिन कावड़ियों पर हमले के आरोपियों की गिरफ्तारी को लेकर व्यापारियों ने सड़क पर उतरकर हल्ला बोल दिया था. प्रदर्शन इतना उग्र था कि पुलिस को लाठीचार्ज तक करना पड़ा था. इस मामले की आग जैसे ही शेखावाटी के सीकर, झुंझुनूं, और चूरू जिले तक पहुंची, कि सरकार इस मसले पर गंभीर हो गई. लाठीचार्ज को लेकर पुलिस ने अपना तर्क दिया, तो व्यापारियों ने पुलिस पर ही सवाल खड़े कर दिए. 

मामले ने तूल पकड़ी, तो पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग को लेकर तीन दिन तक फतेहपुर कस्बा बंद रहा. लक्ष्मणगढ़ कस्बा भी दो दिनों तक बंद रहा. फतेहपुर के बुधगिरी मढी के महंत ने संतों की आपात बैठक बुलाकर आंदोलन तेज करने की चेतावनी दे डाली. 

आंदोलनकारियों ने पुलिस के लाठीचार्ज को गलत बताते हुए मसले को गृहमंत्री तक पहुंचाया. कई बार कलेक्टर और संभागीय आयुक्त के बीच वार्ता हुई, लेकिन बात नहीं बनी. बीजेपी प्रदेशाध्यक्ष मदनलाल सैनी, मंत्री राजेन्द्र राठौड़ भी फतेहपुर पहुंचे. उसके बाद फतेहपुर के पुलिस उपाधीक्ष महमूद खां को एपीओ कर दिया गया. 

पुलिस उपाधीक्षक महमूद खान के एपीओ के आदेश के बाद सियासत फिर गर्मा गई. पुलिस ने कहा कि उसने मामले को संभाला, लेकिन उल्टा पुलिस को कटघरे में खड़ाकर दिया गया. इतना ही नहीं कई संगठनों ने महमूद खान के खिलाफ हुई कार्रवाई का विरोध किया. कई और संगठन खुलकर महमूद खान के समर्थन में उतर आए हैं.

फिलहाल फतेहपुर पुलिस उपाधीक्षक महमूद खान को एपीओ किए जाने के बाद उन लोगों ने तो आंदोलन खत्म कर दिया, जो लागातार पुलिस के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रहे थें, लेकिन जिस तरह से पुलिस अधिकारी के पक्ष में एक नया आंदोलन दिखाई पड़ रहा है, उसे आने वाले वक्त में हिंसा की आहट के तौर पर देखा जा सकता है. लिहाजा कहा जा सकता है कि शेखावाटी में आंदोलन की आग अभी पूरी तरह से बुझी नहीं है. हल्की आंच में सुलगता आंदोलन फिर भयानक रूप न लेले इस बात की चुनौती शासन से लेकर प्रशासन तक के सामने है.