Alwar Pahalwan: पिता के पहलवानी के सपने को पूरा करने के लिए 16 वर्ष की बालिका रज्जी अखाड़े में पसीना बहा रही है. बालिका रज्जी का सपना है कि वह एक दिन अच्छी पहलवान बने. और देश के लिए पहलवानी में मेडल लाकर पिता बल्ले पहलवान का सपना पूरा करे
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पिता का सपना
पिता के पहलवानी के सपने को पूरा करने के लिए 16 वर्ष की बालिका रज्जी अखाड़े में पसीना बहा रही है. बालिका रज्जी का सपना है कि वह एक दिन अच्छी पहलवान बने. और देश के लिए पहलवानी में मेडल लाकर पिता बल्ले पहलवान का सपना पूरा करे. पिता बल्ले भी नामी पहलवान बनना चाहता था. लेकिन गरीबी उनकी प्रतिभा के आड़े आ गई. पिता का मशहूर पहलवान बनने का टूटा सपना उनकी पुत्री रज्जी नहीं देख पाई और महज 16 साल की उम्र में अखाड़े में पहलवानी के दाव पेंच सीखना शुरू किया.
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8 घंटे तक करती है मेहनत
यह बालिका पहलवानी के लिए प्रतिदिन करीब 8 घंटे का समय देती है. पिता बल्ले भी बेटी रज्जी के संघर्ष को परिणाम में बदलने में पूरा साथ दे रहे हैं. बालिका के पिता मजदूरी का कार्य करते है. बालिका रज्जी की पहलवानी के प्रति जिज्ञासा को देख उनके कोच मलखान भी उनके सपने को पूरा करने में साथ दे रहे हैं.
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पिता करते हैं मजदूरी
पिता पहले रज्जी का अभ्यास में देते हैं साथ, फिर मजदूरी पर जाते हैं. पिता बल्ले पहलवान ने बताया कि वो पिछले 20-25 सालों से पहलवानी करते रहे हैं. उन्होंने बताया कि यह उनका सपना था कि पहलवानी के क्षेत्र में मैं मुकाम हासिल करूं. लेकिन पारिवारिक कारणों के चलते मेरा पहलवानी में मेडल लाने का सपना पूरा नहीं हो सका. उन्होंने बताया कि मेरी तीन बेटियां हैं. जिनमें एक बेटी को पहलवानी सिखा रहा है. सुबह मैं अपनी बेटी रज्जी के साथ रनिंग और अभ्यास करता हूं. इसके बाद मैं फल सब्जी मंडी में मजदूरी करने जाता हूं. बल्ले पहलवान ने बताया उसकी आय सीमित है.और कोई सरकारी सहायता नहीं मिलती. लेकिन वह अपनी पुत्री के अभ्यास में कोई कमी नहीं रहने देना चाहता. रज्जी के अभ्यास में कोच मलखान पहलवान, खेल अधिकारी अंजना शर्मा व राजू पहलवान भी भरपूर योगदान दे रहे हैं.
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देश का करना है नाम रोशन
पहलवानी के दाव पेंच सीख रही बालिका रज्जी ने बताया कि बचपन से ही उसने अपने पिता बल्ले पहलवान को अखाड़े में पहलवानी करते देखा. पिछले छह साल से रज्जी अपने पिता से घर पर पहलवानी के दाव पेंच सीख रही है. करीब छह महीने पहले रज्जी ने अलवर के इंदिरा गांधी स्टेडियम के अखाड़े में प्रेटिक्स शुरू की. बालिका रज्जी ने बताया कि उसके पिता का सपना था कि वह नेशनल या इंटरनेशनल कुश्ती प्रतियोगिताओं में देश व राज्य के लिए मेडल लेकर आए. लेकिन गरीबी और पारिवारिक कारणों के चलते पिता बल्ले का सपना अधूरा रह गया. जिसे पूरा करने के लिए अब रज्जी अखाड़े में कुश्ती के दाव पेंच सीख रही है.
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परेशानी का भी करना पड़ा सामना
शुरुआत में परेशानी का करना पड़ा सामना. रज्जी ने बताया कि जब उसने पहलवानी खेलना शुरू किया. तो लोगों ने कहा कि यह खेल लड़कियों का नहीं. बलशाली लोगों का है. लेकिन पिता की ओर से दी हिम्मत और हौंसले की बदौलत आज वे ही लोग उसकी प्रतिभा का लोहा मानते हैं. और कहते हैं कि रज्जी एक दिन जरूर मेडल लेकर आएगी .और अपने पिता का सपना पूरा करेगी. रज्जी के कोच मलखान पहलवान ने बताया कि जब बल्ले पहलवान अपनी बेटी रज्जी को इंदिरा गांधी स्टेडियम के अखाड़े में लेकर आए. तो उन्होंने शुरू में बल्ले पहलवान को अपनी पुत्री को पहलवानी जैसे खेल में नहीं डालने को कहा. लेकिन बल्ले पहलवान ने कहा कि मैं चाहता हूं कि जो सपना मैं पूरा नहीं कर पाया.वह मेरी बेटी पूरा करे.
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कोच ने क्या कहा?
मलखान पहलवान ने बताया कि उन्होंने बालिका रज्जी में पहलवानी के प्रति लगन देखी और उसे प्रतिदिन दो घंटे प्रशिक्षण देने का निश्चय किया. कोच मलखान ने बताया कि रज्जी का पहलवानी के प्रति यही जुनून बरकरार रहा तो वह आगामी दो साल में नेशनल स्तर पर राजस्थान का प्रतिनिधित्व कर मेडल हासिल कर सकती है.