Pratapgarh: ‘आदिवासियों का हरिद्वार’ के रूप में प्रसिद्ध गौतमेश्वर तीर्थ राजस्थान के प्रतापगढ़ जिले में स्थित एक प्राचीन और महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है. यह तीर्थ दक्षिणी राजस्थान के कांठल, वागड़, मालवा और आसपास के क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी समुदायों, विशेष रूप से भील और मीणा जनजातियों, के लिए अत्यंत पवित्र माना जाता है. इस स्थान को आदिवासी समुदाय अपने धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र के रूप में देखते हैं, जहां वे पूजा-अर्चना, अस्थि विसर्जन और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों के लिए एकत्रित होते हैं.
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गौतमेश्वर तीर्थ का महत्व
गौतमेश्वर तीर्थ का महत्व आदिवासी समुदायों के लिए वैसा ही है, जैसा हिंदुओं के लिए हरिद्वार का. यह स्थान न केवल धार्मिक, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक भी है. यहां गौतमेश्वर महादेव का प्राचीन मंदिर है, जिसके बारे में मान्यता है कि यह आदिवासियों के कुलदेवता के रूप में पूजा जाता है. मंदिर के पास बहने वाली जाखम नदी में स्नान और अस्थि विसर्जन की परंपरा रही है, जो इसे ‘आदिवासियों का हरिद्वार’ बनाती है.
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विकास की आस
गौतमेश्वर तीर्थ को ‘आदिवासियों का हरिद्वार’ कहे जाने के बावजूद, इस क्षेत्र में बुनियादी ढांचे और पर्यटन विकास की कमी रही है. स्थानीय लोग और आदिवासी समुदाय लंबे समय से इस तीर्थ को एक प्रमुख पर्यटन और धार्मिक स्थल के रूप में विकसित करने की मांग करते आए हैं, ताकि यह न केवल धार्मिक, बल्कि आर्थिक रूप से भी क्षेत्र के लिए लाभकारी हो.
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Aadivasiyo ka Haridwar
गौतमेश्वर धाम, जिसे ‘आदिवासियों का हरिद्वार’ के नाम से जाना जाता है, राजस्थान के प्रतापगढ़ जिले में स्थित एक पवित्र तीर्थ स्थल है, जो अपनी अनोखी परंपराओं और धार्मिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है.
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Aadivasiyo ka Haridwar
यहां की एक खास परंपरा वैशाख पूर्णिमा के दिन गौतमेश्वर कुंड में स्नान करने की है, जिसके बारे में मान्यता है कि इससे स्नान करने वाले व्यक्ति के सारे पाप धुल जाते हैं. पौराणिक कथाओं के अनुसार, गौतम मुनि ने इसी कुंड में स्नान कर अपने पापों से मुक्ति प्राप्त की थी.
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Aadivasiyo ka Haridwar
आज भी लोग इस कुंड में स्नान कर प्रमाण पत्र प्राप्त करते हैं, जो इस परंपरा की निरंतरता को दर्शाता है. इसके अलावा, गौतमेश्वर धाम में हर साल आयोजित होने वाला सात दिवसीय मेला लाखों श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है, जो भगवान शिव के ज्योतिर्लिंग के दर्शन और मेले के उत्सव का आनंद लेने पहुंचते हैं.
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मेले के लिए पंचायत द्वारा छाया और पानी की समुचित व्यवस्था की जाती है,
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जबकि पुलिस प्रशासन भी सुरक्षा के लिए पूरी तरह चाक-चौबंद रहता है, ताकि किसी भी प्रकार की चूक न हो. यह मेला न केवल धार्मिक, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक एकता का भी प्रतीक है.