Alwar News: सरिस्का टाइगर रिजर्व के जंगलों में एक बार फिर डंपर दौड़ने की संभावना बन गई है. सरकार सरिस्का के क्रिटिकल टाइगर हैबिटेट (CTH) क्षेत्र को सीमित कर मार्बल खनन की अनुमति देने की तैयारी में है. हालांकि, यह कदम न सिर्फ वन्यजीव विशेषज्ञों बल्कि विपक्ष और पर्यावरण प्रेमियों के बीच गंभीर बहस का कारण बन गया है.
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Sariska Tiger Reserve
दरअसल, टहला क्षेत्र सहित सरिस्का के कई वन खंडों को हाल ही में CTH की सीमा से हटाकर बफर जोन में शामिल किया गया है. ये वही क्षेत्र हैं, जहां पहले टाइगर की मूवमेंट बढ़ने पर 2024 में खनन पर रोक लगाई गई थी और माइंस बंद कर दी गई थीं. अब सवाल उठता है कि जब पहले यह क्षेत्र बाघों की सुरक्षा के लिए CTH घोषित हुआ था .तो अब सरकार किस आधार पर उसे फिर से बफर जोन बना रही है.
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सरिस्का का कुल क्षेत्रफल 1213 वर्ग किमी है. जिसे CTH और बफर जोन में बांटा गया है. पिछले साल मल्लाना, तिलवाड़, खोहदरीबा रघुनाथगढ़ जैसे क्षेत्रों को CTH में शामिल किया गया था. लेकिन अब इन सहित कुल 23 वन खंडों को CTH से हटा दिया गया है. इन क्षेत्रों में छोटी छींड, बरवा डूंगरी, बलदेवगढ़, जयसिंहपुरा, कालवाड़, दबकन मैन, सिलीबेरी, मीनाला, सावड़ी आदि शामिल हैं. सरकार ने कुछ क्षेत्रों को बफर से CTH में भी जोड़ा है. जैसे सीरावास, सैदावास, डडीकर. प्रशासन ने खुद स्वीकार किया है कि इन क्षेत्रों में ST 18, ST 29, ST 2403 और ST 2404 जैसे टाइगर का मूवमेंट है. लेकिन सवाल यह है कि जिन क्षेत्रों को CTH से हटाया गया है. वहां भी टाइगर की मौजूदगी क्यों नजरअंदाज की जा रही है.
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टहला क्षेत्र पहले खनन के लिए जाना जाता था. लेकिन टाइगर की गतिविधियों के चलते कोर्ट ने 2024 में इन माइंस को बंद करवाया था. और कहा था कि यह टाइगर रिजर्व का हिस्सा है. बावजूद इसके, अब इन्हें दोबारा बफर जोन घोषित कर खान खोलने की तैयारी की जा रही है. वन प्रेमियों का कहना है कि यह कदम सरासर बाघों की सुरक्षा से खिलवाड़ है. डंपर 24 घंटे चलेंगे. जिससे बाघों के एक्सीडेंट का खतरा रहेगा और उनका मूवमेंट बाधित होगा.
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कांग्रेस नेता टीकाराम जूली ने कहा कि कांग्रेस सरकार के प्रयासों से सरिस्का में एक बार फिर 48 टाइगर हुए हैं. अब बीजेपी सरकार बाघों का पता बदलने में लगी है. गोविंद सिंह डोटासरा ने आरोप लगाया कि बीजेपी के नेता 500 करोड़ की डील कर खान मालिकों को फायदा पहुंचा रहे हैं. पूर्व विधायक ज्ञानदेव आहूजा ने भी केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव और राज्य के वन मंत्री पर इसी तरह के गंभीर आरोप लगाए हैं.
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स्थानीय ग्रामीण इस निर्णय से खुश नजर आ रहे हैं. मल्लाना गांव के एक युवक ने बताया कि खानें बंद होने से बेरोजगारी बढ़ी है. एक खान मजदूर 10 लोगों का पेट पालता था. लेकिन अब पलायन शुरू हो गया है. कमल सिंह नामक ग्रामीण ने कहा कि अगर CTH का दायरा घटता है. तो हम अपने पशुओं को जंगल में चरा सकेंगे और रोजगार मिलेगा. वहीं, सुभाष शर्मा ने कहा कि उन्हें कभी टाइगर नजर नहीं आया. केवल लैपर्ड का मूवमेंट दिखता है.
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जब ‘ZEE Media’ की टीम ने मौके पर पहुंचकर टहला क्षेत्र में मौजूद एक वनकर्मी (टाइगर ट्रैकर) से बात की. तो मामला पलट गया. ट्रैकर ने बताया कि ST_ 25 टाइगर बीते दो वर्षों से इसी इलाके में है .और हाल में ST _2402 टाइगर भी लगातार मूवमेंट कर रहा है. वनकर्मी के इस बयान ने सरकार और वन विभाग की उस रिपोर्ट पर सवाल खड़ा कर दिया. जिसमें कहा गया था कि इन क्षेत्रों में टाइगर मूवमेंट नहीं है.
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कोर्ट के आदेश का उल्लंघन__2024 में कोर्ट ने टहला माइंस क्षेत्र को बंद कर कहा था. कि यह CTH का हिस्सा है. फिर अब क्या टाइगर की सुरक्षा से बड़ा खनन माफियाओं का हित हो गया है. यह सवाल अब हर जगह उठाया जा रहा है. सरकार की मंशा जहां एक ओर ग्रामीणों को रोजगार देने की बात कर रही है. वहीं दूसरी ओर पर्यावरण प्रेमी, विशेषज्ञ और विपक्ष इस कदम को टाइगर की जान के साथ खिलवाड़ बता रहे हैं. टाइगर ट्रैकर की बात मानी जाए तो सरकार सच्चाई छिपा रही है और CTH की सीमा में टाइगर की मौजूदगी को दबा रही है.
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सरकार को चाहिए कि निर्णय पारदर्शिता से ले. टाइगर की सुरक्षा सर्वोपरि रहे और साथ ही स्थानीय लोगों को रोजगार भी मिले. लेकिन यह संतुलन बगैर सच्चाई को स्वीकारे संभव नहीं है. पूर्व मंत्री हेमसिंह भड़ाना का कहना है यह केंद्र सरकार की अच्छी पहल. जिससे टहला, कालवाड़ , मललाना ,तिलवाड़ और खरियावास को CTH से बाहर किया है. वहीं स्थानीय ग्रामीणों ने कहा केंद्रीय वन एवं पर्यावरण और राज्य के वन एवं पर्यावरण मंत्री अच्छा काम कर रहे हैं.