Dungarpur News : एसआई भर्ती में हुई गड़बड़ी के कोर्ट ने परीक्षा रद्द कर दी, और कई गरीब परिवारों के सपने भी टूट गए है . कुछ ऐसा ही हुआ डूंगरपुर के आदिवासी परिवार से आने वाले दिनेश वरहात के साथ भी.
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डूंगरपुर जिले के संचिया गाँव में एक कच्चे घर में रहने वाले दिनेश वरहात का जीवन संघर्षों से भरा रहा है. गरीबी, बेबसी और जिम्मेदारियों से भरे इस सफर में दिनेश ने कभी हार नहीं मानी.मजदूरी से लेकर पुलिस चौकी पर खाना बनाने तक का काम किया, लेकिन दिमाग और दिल में सिर्फ एक सपना था—पुलिस की वर्दी पहननी है, समाज की सेवा करनी है. साल 2021 की SI भर्ती में जब उनका चयन हुआ तो पूरे परिवार की आंखों में चमक आ गई. मां को लगा कि अब गरीबी की काली रात खत्म होगी, भाई-बहनों की पढ़ाई पूरी होगी और घर में खुशहाली लौटेगी.
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दिनेश वरहात शुरू से पढ़ाई में होनहार रहे. पहली से बारहवीं तक सरकारी स्कूल से पढ़ाई की और इसके बाद डूंगरपुर के एसबीपी कॉलेज से स्नातक किया. शिक्षा की प्यास इतनी गहरी थी कि हालात कितने भी मुश्किल हों, पढ़ाई नहीं छोड़ी. गरीबी के दिनों में उन्होंने गुजरात में मजदूरी की, होटल में काम किया और कोरोना काल में जब रोजगार ठप हो गया, तब कनबा चौकी में पुलिसवालों के लिए खाना बनाने का काम भी किया. इन्हीं दिनों उन्होंने ठान लिया कि चाहे जैसे भी हो, अब पुलिस की वर्दी पहनकर ही रहूंगा.
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दिनेश का संघर्ष उन्हें कई बार सफलता दिला चुका था. उनका चयन कांस्टेबल, पटवारी, ग्राम विकास अधिकारी और वनपाल जैसी नौकरियों में भी हुआ. बतौर पटवारी उन्होंने खेरवाड़ा के डबचा में 16 महीने सेवाएं भी दी. लेकिन दिल में पुलिस सेवा का जज्बा इतना गहरा था , कि उन्होंने स्थायी नौकरी छोड़कर भी SI भर्ती की तैयारी जारी रखी. दिनेश की सबसे बड़ी खूबी यह रही कि उन्होंने सिर्फ खुद को नहीं संवारा, बल्कि दूसरों की जिंदगी भी बदली. उन्होंने डूंगरपुर के आदिवासी छात्रावास में तीन साल तक बच्चों को बिना किसी शुल्क के पढ़ाया. उनकी मेहनत का नतीजा यह है कि आज उनके पढ़ाए हुए 100 से ज्यादा बच्चे सरकारी सेवाओं में हैं. इनमें से करीब 40 पुलिस विभाग में, जबकि बाकी वनपाल, ग्राम विकास अधिकारी और अन्य पदों पर कार्यरत हैं. यह योगदान बताता है कि दिनेश जैसे नौजवान सिर्फ अपने भविष्य की चिंता नहीं करते, बल्कि समाज को भी नई दिशा देने का जज्बा रखते हैं.
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दिनेश के पिता अमृतलाल लंबे समय से बीमार हैं. घर की हालत ऐसी है कि आज भी कच्चा मकान है और घर तक जाने का रास्ता भी पक्का नहीं है. मां शारदा कभी नरेगा में काम करके, कभी अनाज बेचकर, तो कभी गांव-घर में छोटे-मोटे काम करके बच्चों को पढ़ाती रहीं. दिनेश सबसे बड़े बेटे हैं और उन पर ही पूरे परिवार की जिम्मेदारी है. मां शारदा रोते हुए कहती हैं—“बेटे की नौकरी लगी तो लगा अब जिंदगी बदल जाएगी. मगर अब कोर्ट ने भर्ती रद्द कर दी. मैं मर भी नहीं सकती, पीछे पांच बच्चे हैं. घर आज भी अधूरा है, शादी की उम्र हो गई पर बेटियों की शादी के लिए कुछ नहीं है. ”भाई जितेश ने बताया कि भाई सबसे बड़ा है , खूब मेहनत करता था. उसकी नौकरी लगी तो मैंने पढ़ाई छोड़ दी थी और ड्राइविंग करने लगा. मगर भाई ने ही मुझे वापस पढ़ाई के लिए तैयार किया. कोर्ट के फैसले से पूरा परिवार उजड़ गया है”
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राजस्थान हाईकोर्ट ने हाल ही में 2021 की SI भर्ती को गड़बड़ी के चलते रद्द कर दिया. इस फैसले का असर सिर्फ दिनेश पर ही नहीं, बल्कि हजारों मेहनतकश युवाओं पर पड़ा है, जिन्होंने कठिन परिश्रम और सालों की तैयारी के बाद यह मुकाम हासिल किया था. अभ्यर्थियों का कहना है कि गड़बड़ी करने वालों पर सख्त कार्रवाई हो, लेकिन जिन्होंने ईमानदारी से मेहनत कर सफलता पाई है, उन्हें इस तरह सजा देना न्यायसंगत नहीं है.
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बेटे की नौकरी लग गयी थी, मां-बाप को लगा था कि घर पक्का हो जाएगा, लेकिन अब सपने टूट चुके हैं. भाई की पढ़ाई का सपना, बच्चों की शादी का सपना और पहले से बेहतर जिंदगी की उम्मीद सब खत्म का हो गया लगता है. दिनेश वरहात की कहानी सिर्फ एक व्यक्ति या एक परिवार की नहीं है. यह कहानी उन हजारों युवाओं की है, जो गरीबी और संघर्ष के बीच सपने देखते हैं और उन्हें पूरा करने के लिए दिन-रात मेहनत करते हैं. कोर्ट के एक फैसले ने उनके भविष्य को अधर में लटका दिया है. आज जरूरत है कि सरकार और न्यायपालिका ऐसे युवाओं की मेहनत और ईमानदारी का सम्मान करें. गड़बड़ी करने वालों पर सख्ती हो, लेकिन संघर्ष करने वालों को न्याय मिले. क्योंकि जब मेहनतकश युवा हताश होंगे, तो समाज की रीढ़ कमजोर हो जाएगी.