Pratapgarh News : डॉक्टर्स डे पर देशभर में जहां डॉक्टरों को सलाम किया जा रहा है, वहीं प्रतापगढ़ जिला अस्पताल में एक सवाल गूंज रहा है. जब डॉक्टर ही नहीं होंगे, तो इलाज कौन करेगा ? 80 पदों में सिर्फ 20 डॉक्टर, और उनमें से भी दो जल्द रिटायर… इलाज के नाम पर यहां मरीजों को मिल रही है सिर्फ इंतजार की लाइन और रेफर की चिट्ठी.
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प्रतापगढ़ जिले का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल, जहां हर दिन में ही हजारों मरीज इलाज की उम्मीद लेकर पहुंचते हैं. लेकिन यहां डॉक्टर हैं, ही नहीं. 80 स्वीकृत पदों में से 65 खाली पड़े हैं. केवल 17 स्थायी और 3 अस्थायी यूटीबी डॉक्टर ही पूरे अस्पताल का बोझ संभाल रहे हैं.
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मतलब 20 डॉक्टरों के भरोसे करीब 4 लाख मरीजों का वार्षिक इलाज. वायरल सीजन में ओपीडी 1500 तक पहुंचती है. लेकिन इलाज करने वाले डॉक्टर उंगलियों पर गिने जा सकते हैं. डॉक्टरों की भारी कमी और रिटायरमेंट की कतार में खड़े विशेषज्ञों ने हालात और गंभीर कर दिए हैं।.
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जिला अस्पताल में विशेषज्ञ डॉक्टरों की भारी कमी है. 23 कनिष्ठ विशेषज्ञ पदों में से सिर्फ 1 कार्यरत है। 10 वरिष्ठ विशेषज्ञों में से सिर्फ 2 हैं. 4 वरिष्ठ चिकित्सा अधिकारी के पद पूरी तरह खाली हैं. यहां तक कि उपनियंत्रक का एकमात्र पद भी खाली है. 33 चिकित्सा अधिकारियों में से केवल 10 कार्यरत हैं और 8 पद मानकों के अनुसार स्वीकृत हैं, जिनमें भी केवल 1 डॉक्टर मौजूद है.
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ये हालात ऐसे जिले के हैं जो जनजातीय बाहुल्य क्षेत्र में आता है, और यहां के अधिकांश ग्रामीणों की निर्भरता सरकारी अस्पताल पर ही है. निजी इलाज न तो सबके बस की बात है और न ही हर गांव-कस्बे में इसकी पहुंच है. जिला अस्पताल में अक्टूबर 2025 में नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. राधेश्याम कच्छावा और महिला रोग विशेषज्ञ डॉ. नीलम शुक्ला भी रिटायर होने जा रहे हैं.
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इसके बाद फिजिशन और आईसीयू इंचार्ज डॉ. राजकुमार जोशी मई 2026 में रिटायर हो जाएंगे. वह अस्पताल में इकलौते फिजिशन है. उनके जाने के बाद गंभीर मेडिकल मरीजों को देखने वाला कोई नहीं होगा. उनके जाने के बाद विशेषज्ञ डॉक्टरों की संख्या और घट जाएगी. यह साफ संकेत है कि अस्पताल में 20 डॉक्टरों की जगह इनके रिटायरमेंट के बाद 17 डॉक्टर ही बचेंगे.
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अस्पताल प्रशासन और कार्यरत डॉक्टर बार-बार रिक्त पदों को भरने की मांग कर चुके हैं, लेकिन सुनवाई अब तक नहीं हुई. डॉक्टरों पर काम का दबाव इतना अधिक है कि मानसिक तनाव तक पहुंच गया है. एक डॉक्टर को तीन-तीन यूनिट देखनी पड़ रही है. विशेषज्ञ की गैरमौजूदगी में मरीजों को उदयपुर रेफर करना पड़ता है.
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यह हाल तब है जब प्रतापगढ़ जैसे आदिवासी और दूरस्थ जिले को प्राथमिकता मिलनी चाहिए थी. हर साल 3 से 4 लाख मरीज इलाज के लिए आते हैं. लेकिन चिकित्सा विभाग और सरकार की लापरवाही ने अस्पताल को महज रेफर सेंटर बना दिया है. इलाज के नाम पर मरीज को लाइन, इंतजार और निराशा ही मिलती है.