Barmer News: राजस्थान के बाड़मेर जिले के रामसर और सेडवा जैसे छोटे गांवों की ढाणियों में नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो ने छापा मारा तो वहां के खेतों और मकानों के बीच छिपी मेफेड्रोन (MD) बनाने की कई फैक्ट्रियां मिलीं.
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राजस्थान के सीमांत जिले बाड़मेर की पहचान अब तक अपने मरुस्थलीय सौंदर्य, सरल संस्कृति और शांत जीवन के लिए रही है लेकिन हाल के महीनों में यहां से जो खबरें सामने आई हैं, उन्होंने पूरे देश को झकझोर दिया है. रामसर और सेडवा जैसे छोटे गांवों की ढाणियों में जब पुलिस और नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) की टीमों ने छापा मारा, तो वहां खेतों और मकानों के बीच छिपी मेफेड्रोन (MD) बनाने की फैक्ट्रियां मिलीं. वही घातक सिंथेटिक ड्रग जिसे 'पार्टी ड्रग' और 'डिजाइनर नशा' कहा जाता है. जांच में जो खुलासे हुए, उन्होंने ये साफ कर दिया कि बाड़मेर अब केवल सीमा का जिला नहीं, बल्कि भारत के नशे के नेटवर्क का एक उभरता हब बनता जा रहा है. रेत की इस शांत भूमि में छिपा यह जहर न सिर्फ सीमाओं को, बल्कि समाज की आत्मा को भी खोखला करने लगा है. रामसर और सेडवा इलाकों में की गई कार्रवाई में पुलिस ने करीब 30 किलो MD ड्रग, भारी मात्रा में रासायनिक पदार्थ, लैब उपकरण और रिएक्टर टैंक जब्त किए. पुलिस ने इस प्रकरण में कुल 8 लोगों को गिरफ्तार किया, जिनमें तीन आरोपी राजस्थान से और पांच महाराष्ट्र से हैं. राजस्थान से पकड़े गए आरोपियों में कई ऐसे लोग भी शामिल है, जो तकनीकी रूप से प्रशिक्षित व्यक्ति है.
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बाड़मेर के रमेश विश्नोई और हनुमानराम चौधरी फैक्ट्री संचालन और स्थानीय सप्लाई चेन का काम संभालते थे. महाराष्ट्र से पकड़े गए रोहन साळुंखे, विक्रम कदम और सतीश नाइक इस नेटवर्क के बड़े लिंक थे, ये लोग मुंबई और रायगड जिले से केमिकल और मशीनें सप्लाई कर रहे थे. जांच एजेंसियों को पता चला कि MD बनाने के लिए जरूरी रासायनिक सामग्री महाराष्ट्र और गुजरात से लाई जा रही थी, जबकि तैयार ड्रग्स की सप्लाई मुंबई के क्लब, रेव पार्टी और ऑनलाइन ब्लैक नेटवर्क तक जाती थी. इस तरह बाड़मेर, जो कभी भारत की सीमा का प्रहरी था, अब नशे की कड़ी का गुप्त अड्डा बन गया. फैक्ट्री चलाने का तरीका बेहद योजनाबद्ध था. ग्रामीण क्षेत्रों की उन ढाणियों को चुना गया जहां न तो मोबाइल नेटवर्क मज़बूत था, न पुलिस की नियमित गश्त. रासायनिक सामग्री ट्रकों में 'फार्म के लिए खाद या पेंट सॉल्वेंट' के नाम पर भेजी जाती थी. अंदर बने कमरों में आधुनिक लैब जैसी व्यवस्था थी-रिएक्टर टैंक, ग्लास फ्लास्क, हाइड्रोक्लोरिक एसिड, एसिटोन, टोल्यून जैसे घातक रसायन, और ड्राईंग मशीनें. NCB की टीम जब अंदर पहुंची, तो दीवारों पर रासायनिक सूत्र और तापमान नियंत्रण के चार्ट तक मिले यानी यह सिर्फ कोई देसी कच्चा प्रयोग नहीं, बल्कि तकनीकी जानकारी से लैस, संगठित अपराध उद्योग था.
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नशे का फैलाव केवल एक आपराधिक समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक आपदा बन चुका है. बाड़मेर, जैसलमेर और जोधपुर जिलों में पिछले दो वर्षों में NDPS एक्ट के तहत दर्ज मामलों की संख्या तीन गुना बढ़ी है. पुलिस रिकॉर्ड बताते हैं कि चोरी, लूट, साइबर ठगी और यहां तक कि हत्या जैसे अपराधों में अब नशे की भूमिका स्पष्ट दिखती है. हाल ही में जोधपुर के ओसियां से एक मामला सामने आया, जिसमें एक पोते ने ऑनलाइन गेम और नशे की लत के कारण पैसे की ज़रूरत में अपनी ही दादी की हत्या कर दी. भारतीय समाज में जहां दादी-पोते का रिश्ता स्नेह और संस्कार का प्रतीक माना जाता है, वहां ऐसे अपराध यह दिखाते हैं कि नशा अब पारिवारिक ढांचे को तोड़ रहा है.
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मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, MD जैसे ड्रग्स मस्तिष्क में तीव्र उत्तेजना और भ्रम की स्थिति पैदा करते हैं, जिससे व्यक्ति तर्कशक्ति खो देता है. MD (मेफेड्रोन) या 'मीठा', 'माउली' जैसे नामों से बिकने वाला यह सिंथेटिक नशा अब युवाओं में सबसे तेजी से फैल रहा है. यह पाउडर रूप में होता है और नाक से सूंघकर या इंजेक्शन के रूप में लिया जाता है.
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एक ग्राम की कीमत मुंबई में ₹5000 तक होती है, लेकिन इसे बनाने में लागत ₹300 से भी कम आती है यही कारण है कि तस्कर इसे 'गोल्ड माइन' मानते हैं. UNODC (संयुक्त राष्ट्र ड्रग नियंत्रण एजेंसी) की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 2020 से 2024 के बीच सिंथेटिक ड्रग्स की जब्ती में 220% वृद्धि हुई है. सबसे अधिक मामले राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात, गोवा और दिल्ली से आए हैं. बाड़मेर प्रकरण ने सरकार और एजेंसियों की निगरानी व्यवस्था की सीमाओं को भी उजागर किया है.
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कई रासायनिक पदार्थ NDPS एक्ट के 'नियंत्रित पदार्थों' की सूची में नहीं आते, जिससे अपराधी उनका वैध व्यापार दिखाकर प्रयोग कर लेते हैं. दूसरी समस्या है लॉजिस्टिक नियंत्रण की कमी ट्रांसपोर्ट कंपनियां यह नहीं देखतीं कि वे क्या ढो रही हैं? राज्य सरकार ने अब NDPS मामलों की जांच के लिए स्पेशल टास्क फोर्स (STF) बनाई है, और NCB ने राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र के बीच साझा इंटेलिजेंस यूनिट गठित की है लेकिन असली चुनौती समाज के स्तर पर है जहां हर गांव में नशे के खिलाफ सामूहिक चेतना बनानी होगी. इस प्रकरण में कुल 10 आरोपियों को नामजद किया गया है.
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बाड़मेर पुलिस अधीक्षक नरेंद्र सिंह मीणा ने बताया कि बीते कुछ वर्षों में अंतरराष्ट्रीय सरहद से सटे बाड़मेर जिले में अब तक दो MD (मेफेड्रोन) बनाने वाली फैक्ट्रियां पकड़ी जा चुकी हैं.उन्होंने कहा कि पुलिस और नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो की संयुक्त टीम लगातार इस नेटवर्क की जड़ तक पहुंचने का प्रयास कर रही है. हम नशे के इस पूरे नेक्सस को तोड़ने के लिए लगातार सघन अभियान चला रहे हैं. सीमावर्ती इलाकों में निगरानी बढ़ाई गई है और हर संदिग्ध गतिविधि पर पैनी नजर रखी जा रही है.