Rajasthan News: राजस्थान के भीलवाड़ा जिले के माण्डल कस्बे में दिवाली के दूसरे दिन एक अनोखी परंपरा देखने को मिलती है, जहां कुम्हार समाज के लोग गधों की पूजा बड़े हर्षोल्लास से करते हैं. यह परंपरा वर्षों पुरानी है और गधों को कुम्हारों की रोजी-रोटी का आधार माना जाता है.
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Diwali 2025
दिवाली के अगले दिन, जो अन्नकूट और गोवर्धन पूजा के रूप में भी मनाया जाता है, माण्डल के कुम्हार समाज के लोग अपने अन्नदाता के रूप में गधों का सम्मान करते हैं, ठीक वैसे ही जैसे किसान अपने बैलों की पूजा करते हैं. यह दृश्य न केवल सांस्कृतिक धरोहर को दर्शाता है, बल्कि स्थानीय लोगों के लिए आस्था और परंपरा का प्रतीक भी है.
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माण्डल के निवासियों के अनुसार, गधों का उपयोग मिट्टी ढोने जैसे कार्यों में किया जाता रहा है, जो कुम्हारों की आजीविका का मुख्य साधन रहा है. इसीलिए गधों को पूजने की परंपरा शुरू हुई, जो आज भी कायम है. इस दिन कुम्हार समाज के लोग एकत्रित होकर गधों को सजाते हैं. उन्हें नहलाया जाता है, रंग-बिरंगी पेंटिंग्स और फूलों की मालाओं से सजाया जाता है. इसके बाद पूजा-अर्चना की जाती है और गधों को मिठाई खिलाई जाती है.
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एक अनोखा रिवाज यह भी है कि उनके पैरों में पटाखे बांधकर उन्हें भगाया जाता है, जिसे देखने के लिए आसपास के गांवों से भी लोग पहुंचते हैं. यह दृश्य उत्सव का माहौल बना देता है और बच्चों से लेकर बूढ़ों तक सभी इसमें हिस्सा लेते हैं.
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माण्डल के वरिष्ठ कुम्हार गोपाल कुम्हार बताते हैं, "हमारे पूर्वजों ने लगभग 70 साल पहले बैसाख नंदन पर्व की शुरुआत की थी. उस समय हर घर में गधे होते थे, जो हमारी रोजी-रोटी का आधार थे. मिट्टी ढोने से लेकर अन्य कार्यों में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण थी. जैसे-जैसे आधुनिक साधन बढ़े, गधों की संख्या कम हुई, लेकिन हमने उन्हें भुलाया नहीं.
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हमारे पूर्वज दिवाली के दूसरे दिन उनकी पूजा करते थे, और हम भी उसी परंपरा को निभाते हैं." यह परंपरा न केवल आर्थिक महत्व को दर्शाती है, बल्कि पारिवारिक और सामुदायिक एकता को भी मजबूत करती है.
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इस उत्सव में शामिल होने वाले लोग बताते हैं कि गधों की सजावट और पटाखों का दृश्य देखने लायक होता है. कस्बे में इस दिन खास मिठाइयों और पारंपरिक व्यंजनों का भी आयोजन होता है. पर्यटकों के लिए भी यह अनोखा आकर्षण बन रहा है, जो माण्डल की सांस्कृतिक पहचान को बढ़ावा दे रहा है.