Ajmer Sharif Dargah: अजमेर शरीफ स्थित ख्वाजा गरीब नवाज़ की दरगाह भारत में सूफी आस्था का एक प्रमुख केंद्र है. मोहर्रम का महीना, जो इस्लामी कैलेंडर का पहला महीना है, यहां विशेष महत्व रखता है.ऐसे में 6 जुलाई 2025 को भी दरगाह में देश-विदेश से भारी संख्या में अकीदतमंदों की भीड़ उमड़ेगी, जो इमाम हुसैन और ख्वाजा गरीब नवाज़ के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करेंगे.
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अजमेर शरीफ स्थित ख्वाजा गरीब नवाज़ की दरगाह भारत में सूफी आस्था का एक प्रमुख केंद्र है. मोहर्रम के दौरान दरगाह शरीफ में एक अलग ही माहौल देखने को मिलता है, जो अकीदत और गम का संगम होता है.
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मोहर्रम का महीना पैगंबर मोहम्मद के नवासे हज़रत इमाम हुसैन और उनके साथियों की कर्बला में हुई शहादत की याद दिलाता है. इस दौरान दरगाह शरीफ में एक अलग ही माहौल देखने को मिलता है.
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मोहर्रम के महीने की शुरुआत होते ही, दरगाह में साल भर चलने वाली कव्वालियों का सिलसिला थम जाता है. यह इमाम हुसैन की शहादत के ग़म में इज़हार का प्रतीक है.
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मोहर्रम के दौरान अजमेर दरगाह में आने वाले ज़ायरीन इमाम हुसैन की कर्बला की शहादत को याद करते हुए दुआएं मांगते हैं और अपना पुरसा पेश करते हैं.
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पूरे अजमेर शहर और विशेष रूप से दरगाह शरीफ में ग़म-ए-हुसैन (इमाम हुसैन का गम) का माहौल छा जाता है, जहां लोग अपने दुख और शोक का इजहार करते हैं.
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मोहर्रम की विभिन्न तारीखों पर दरगाह और शहर के इमामबाड़ों में अलम और चौकी के जुलूस निकाले जाते हैं, जिनकी ज़ियारत के लिए भारी संख्या में अकीदतमंद उमड़ते हैं.
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मोहर्रम के दौरान ताज़िए बनाए और सजाए जाते हैं, जिनमें से कुछ बहुत भव्य होते हैं. अजमेर दरगाह में चांदी के ताज़िए भी आकर्षण का केंद्र बनते हैं, जिन्हें देखने दूर-दूर से लोग आते हैं.
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यह महीना इस्लामी इतिहास में सत्य, न्याय, धैर्य और बलिदान की मिसाल पेश करता है, जिसकी प्रेरणा पूरे विश्व में फैलती है.
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यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं Zee Rajasthan इसकी पुष्टि नहीं करता हैं