Aravalli Illegal Mining: अरावली संरक्षण को लेकर सरकारों के दावों की पोल खुली है. खैरथल-तिजारा जिले के कहरानी गांव में अवैध खनन से पहाड़ों का पूरी तरह समतलीकरण हो रहा है, जिससे प्राकृतिक ढाल खत्म हो रही है, इसी के साथ ही वहां पर गड्ढे और झीलें बन गई हैं. जिसका पर्यावरण पर गंभीर असर हो रहा है.
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Illegal Mining Of Aravali
देश में इन दिनों अरावली संरक्षण को लेकर सियासी और प्रशासनिक गलियारों में जबरदस्त बहस चल रही है. केंद्र और प्रदेश सरकारें अरावली को बचाने के अपने अपने दावे पेश कर रही हैं. कहीं कानूनों की दुहाई दी जा रही है, तो कहीं विकास की जरूरतों का हवाला दिया जा रहा है. लेकिन इन तमाम दावों की सच्चाई जानने के लिए जब जी मीडिया की टीम राजस्थान के खैरथल-तिजारा जिले की औद्योगिक नगरी भिवाड़ी के कहरानी गांव पहुंची, तो जमीनी हकीकत ने तमाम सरकारी दावों की पोल खोल कर रख दी.
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मेवात बेल्ट के इस इलाके में जी मीडिया की टीम ने ग्राउंड जीरो पर जाकर जो मंजर देखा, वो किसी भी इंसान को झकझोर देने वाला था. कभी अरावली की पहचान रहे ऊंचे ऊंचे पहाड़ आज इतिहास बन चुके हैं. जहां कभी पहाड़ों की लंबी श्रृंखलाएं दिखाई देती थीं, वहां अब पानी से भरी बड़ी झीलें नजर आती हैं. अरावली का सीना छलनी कर दिया गया है. बड़े-बड़े पर्वत पूरी तरह समतल कर दिए गए हैं और जो चट्टानें बची हैं, वो दूर से मोबाइल टावर जैसी खड़ी दिखाई देती हैं.
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ग्राउंड रिपोर्टिंग के दौरान यह साफ दिखाई दिया कि यहां से निकला करोड़ों रुपये का पत्थर दिल्ली, नोएडा और गुरुग्राम की बड़ी इमारतों में तब्दील हो चुका है. महानगरों की चमकदार बिल्डिंगें खड़ी हो गईं, लेकिन इसकी कीमत मेवात की अरावली ने चुकाई. जिस अरावली को देश की प्राकृतिक ढाल कहा जाता है, वही अरावली आज गड्ढों, झीलों और उजाड़ में बदलती नजर आ रही है. कहरानी गांव अवैध खनन को लेकर पहले भी कई बार सुर्खियों में रहा है.
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स्थानीय लोगों का कहना है कि एक समय था जब इस पूरे इलाके में बड़े पहाड़ और पर्वत मालाएं हुआ करती थीं. आज उन्हीं पहाड़ों के नामोनिशान तक मिट चुके हैं. जी मीडिया की टीम जब आगे बढ़ी तो पथरीले और खतरनाक रास्तों ने सफर को और मुश्किल बना दिया. कई जगहों पर पैदल चलना भी जोखिम भरा था. ऐसे में एक स्थानीय ग्रामीण की मदद से टीम ने ट्रैक्टर के जरिए आगे का सफर तय किया और कैमरे में उन तमाम तस्वीरों को कैद किया, जिन्हें देखकर रूह कांप उठती है.
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स्थानीय लोगों ने बताया कि पहाड़ों की खुदाई और लगातार हो रही ब्लास्टिंग से पूरे इलाके में हमेशा डर का माहौल बना रहता था. ब्लास्टिंग के दौरान बड़े-बड़े पत्थर गोली की रफ्तार से उड़ते हुए सीधे उनके घरों तक पहुंच जाते थे. कई बार तो लोग अपने बच्चों को लेकर घरों से बाहर निकलने से भी डरते थे. खेत, मकान और रास्ते सब खतरे की जद में रहते थे, लेकिन अवैध खनन का यह खेल बेरोकटोक चलता रहता था.
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आज हालात यह हैं कि अरावली की जगह गहरे गड्ढे और पानी से भरी झीलें बची हैं. पर्यावरण संतुलन पर इसका सीधा असर पड़ रहा है. जी मीडिया की यह ग्राउंड रिपोर्टिंग सीधे तौर पर सिस्टम पर सवाल खड़े करती हैं.