Krishna Janmashtami 2025: जन्माष्टमी के पावन अवसर पर, राजस्थान में आस्था का एक ऐसा अद्भुत संगम देखने को मिलता है, जिसे 'त्रिवेणी दर्शन' के नाम से जाना जाता है. इस दिन हजारों श्रद्धालु एक ही दिन में तीन मंदिरों के दर्शन कर भगवान श्रीकृष्ण के संपूर्ण स्वरूप का पुण्य फल प्राप्त करते हैं.
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Krishna Janmashtami 2025
धार्मिक मान्यता के अनुसार, जन्माष्टमी के दिन सूर्योदय से सूर्यास्त के बीच करौली के मदन मोहन जी के चरण, जयपुर के गोपीनाथ जी का वक्षस्थल-भुजाएं और गोविंद देव जी का मुखारविंद दर्शन करने से भगवान श्रीकृष्ण के संपूर्ण दर्शन का सौभाग्य मिलता है.
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भक्त इसी आस्था के साथ सदियों पुरानी इस परंपरा का निर्वहन करते हैं. यह सिर्फ एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि कृष्ण प्रेम का एक जीवंत प्रमाण है, जो सदियों से भक्तों की आस्था को जोड़े हुए है.
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इन तीनों विग्रहों का इतिहास भी बेहद खास है. माना जाता है कि इन मूर्तियों का निर्माण स्वयं भगवान श्रीकृष्ण के प्रपौत्र वज्रनाभ ने एक ही काले पत्थर से किया था. वज्रनाभ ने अपनी दादी के बताए हुए श्रीकृष्ण के प्रत्यक्ष स्वरूप के अनुसार ये विग्रह बनवाए थे.
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कहा जाता है इन तीनों विग्रहों का सफर भी बेहद रोमांचक रहा है. आक्रमणकारियों से बचाने के लिए इन्हें कई बार गुप्त स्थानों पर छिपाया गया. महमूद गजनवी के समय इन्हें धरती में छुपाया गया था और सदियों बाद चैतन्य महाप्रभु के शिष्यों, रूप और सनातन गोस्वामी ने इन्हें वृंदावन में पुनः प्रतिष्ठित किया.
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बाद में, औरंगजेब के मंदिरों को तोड़ने के आदेश के बाद पुजारियों ने इन्हें जंगलों में छिपाया और फिर आमेर तथा जयपुर के शाही संरक्षण में इन्हें सुरक्षित रखा गया.
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सवाई जयसिंह ने जयपुर बसाने के बाद इन विग्रहों को जयनिवास उद्यान के सूर्य महल में स्थापित कराया. हालांकि, मदन मोहन जी विवाह की एक परंपरा के चलते करौली लौट गए, जबकि गोपीनाथ जी शेखावाटी सरदारों के साथ जयपुर आ गए.
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आज भी गोपीनाथ जी की मूर्ति अपनी कलाई पर घड़ी पहने हुए दर्शन देती है, जिसकी कहानी एक अंग्रेज अधिकारी के चमत्कार से जुड़ी हुई है.
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करौली से जयपुर तक फैली यह राह बताती है कि कृष्ण से जुड़ने के लिए न समय की दूरी मायने रखती है, न स्थान की. बस दिल में प्रेम और आंखों में विश्वास होना चाहिए.