Mughal: मुगल शासनकाल में 1608 में विलियम हॉकिंस जहाज 'हेक्टर' के साथ सूरत पहुंचा और जहांगीर को प्रभावित कर अंग्रेजों को पहली फैक्ट्री खोलने की अनुमति दिलाई. यहीं से भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी की नींव पड़ी, जिसने आगे चलकर देश को गुलामी की ओर धकेला.
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गुलामी की राह
भारत का इतिहास कई उतार-चढ़ाव और संघर्षों से भरा हुआ है. इन्हीं घटनाओं में एक ऐसा अध्याय भी है, जिसने आगे चलकर देश को गुलामी की राह पर धकेल दिया. यह कहानी उस अंग्रेज की है, जिसने अपने चातुर्य और चापलूसी से मुगलों का विश्वास जीता और अंग्रेजी हुकूमत की नींव रखी.
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ईस्ट इंडिया कंपनी का पहला जहाज सूरत आया
24 अगस्त 1608 को इंग्लैंड से आया ईस्ट इंडिया कंपनी का पहला जहाज 'हेक्टर' सूरत के बंदरगाह पर लंगर डालता है. इस जहाज का कैप्टन था विलियम हॉकिंस, जो आगे चलकर अंग्रेजों की भारत में पकड़ मजबूत करने का रास्ता बना. उस समय सूरत मुगल साम्राज्य का एक अहम व्यापारिक केंद्र था, जहां से विभिन्न देशों के साथ समुद्री व्यापार होता था. कंपनी का मकसद यहां अपनी व्यापारिक गतिविधियां शुरू करना था, लेकिन इसके लिए बादशाह की इजाजत जरूरी थी.
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जहांगीर के दरबार में पहुंचा
हॉकिंस इंग्लैंड के राजा जेम्स प्रथम का पत्र लेकर जहांगीर के दरबार में पहुंचा. वह फारसी और तुर्की भाषा जानता था, जिससे उसने मुगल सम्राट को प्रभावित कर लिया. जहांगीर ने न केवल उसे अपने दरबार में जगह दी, बल्कि 400 सवारों का मनसबदार भी बना दिया. इतना ही नहीं, उसे 'खान' की उपाधि प्रदान की और एक ईसाई युवती से विवाह भी करवा दिया.
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पांच साल तक मुगलों की सेवा की
करीब पांच साल तक हॉकिंस ने मुगलों की सेवा की, लेकिन उसकी नीयत कंपनी के हित साधने की थी. उसने जहांगीर से भारत में अंग्रेजों की पहली फैक्ट्री खोलने की अनुमति हासिल कर ली. इसके बाद 11 जनवरी 1613 को सूरत में कंपनी की पहली फैक्ट्री स्थापित हुई, जहां मुख्य रूप से गद्दे और रजाई बनाने का काम शुरू किया गया. यही कारखाना आने वाले समय में भारत की गुलामी का कारण बना.
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पुर्तगाली और डच से मुगलों के रिश्ते बिगड़े
उस दौर में पुर्तगाली और डच व्यापारी पहले से ही भारत में सक्रिय थे और मुगलों के साथ उनके अच्छे संबंध थे. लेकिन अंग्रेजों को मिली यह अनुमति उनके लिए चुनौती बन गई और उनके रिश्तों में दरार पड़ने लगी.
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कंपनी की सेना की मंजूरी मिली
आगे चलकर 1616 में इंग्लैंड का राजदूत सर टॉमस रो भारत आया. उसने नूरजहां और शाहजहां (तब के खुर्रम) को कीमती तोहफे देकर प्रभावित किया और जहांगीर से कंपनी की सेना लाने की मंजूरी भी मांग ली. यही वह मोड़ था और मुगलों की सबसे बड़ी गलती थी, जिसने अंग्रेजों के लिए भारत में सत्ता की राह आसान बना दी.
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