Mughal: भारत में दिवाली की चमक दीपों और आतिशबाजी से जुड़ी है. पटाखों की शुरुआत चीन में हुई और मुगल काल में भारत आई. 15वीं सदी से उत्सवों में आतिशबाजी का चलन शुरू हुआ. 19वीं सदी में कोलकाता और शिवकाशी में फैक्ट्रियां बनने से यह परंपरा और मजबूत हुई.
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भारत में दिवाली सिर्फ एक पर्व नहीं, बल्कि रोशनी, उत्साह और परंपरा का संगम है. दीपों की जगमगाहट और आतिशबाजी के बिना इस त्योहार की कल्पना अधूरी लगती है. हालांकि, यह सवाल हमेशा दिलचस्प रहा है कि आखिर दिवाली में पटाखों का चलन कब और कैसे जुड़ा.
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इतिहासकारों के अनुसार, भारत में पटाखों के शुरुआती निशान मुगल काल से मिलते हैं. कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि बारूद बनाने के घटकों का ज्ञान भारत में करीब 300 ईसा पूर्व से ही मौजूद था. द हेरिटेज लैब की एक रिपोर्ट बताती है कि पटाखों की शुरुआत चीन में हुई थी, जहां सबसे पहले बारूद का प्रयोग हुआ.
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चीन में बारूद, शोरा, गंधक और चारकोल को मिलाकर आतिशबाजी तैयार की जाती थी. इन तत्वों का उल्लेख दूसरी सदी में ‘बुक ऑफ द किंशिप ऑफ द थ्रीज’ नामक दस्तावेज़ में मिलता है. माना जाता है कि शोरा और गंधक के प्रयोग का उल्लेख चीन में पहली सदी से पहले ही हो चुका था.
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भारत में बारूद के प्रयोग के संकेत आठवीं शताब्दी से दिखाई देते हैं. संस्कृत ग्रंथ वैशम्पायन की नीतिप्रकाशिका में ऐसे पदार्थों का जिक्र है. कौटिल्य के अर्थशास्त्र (300 ईसा पूर्व - 300 ईस्वी) में भी शोरा का उल्लेख ‘अग्निचूर्ण’ के रूप में मिलता है. हालांकि, उस दौर में इसका इस्तेमाल मुख्यतः युद्धों में होता था, न कि उत्सवों में.
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15वीं शताब्दी से भारत में शादियों और त्योहारों में आतिशबाजी का इस्तेमाल आम हो गया. मुगल चित्रों में इसका उल्लेख मिलता है. शाहजहां के पुत्र दारा शिकोह के विवाह (1633) को दर्शाती एक पेंटिंग में भव्य आतिशबाजी का चित्रण देखा जा सकता है.
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इतिहासकारों का मानना है कि इसी काल में दिवाली जैसे त्योहारों में भी पटाखों का चलन शुरू हुआ. 17वीं सदी में बीजापुर के आदिल शाह ने अपने विवाह में 80,000 रुपये सिर्फ आतिशबाजी पर खर्च किए थे. जो इसकी लोकप्रियता का प्रमाण है.
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