Mughal: मुगल काल में दिवाली और गोवर्धन पूजा भव्यता से मनाई जाती थी. अकबर से बहादुर शाह ज़फ़र तक सम्राटों ने इसे उत्साह से मनाया. गाय सजाने, दान-दक्षिणा, दीप सजावट और सिक्कों से तौलकर गरीबों में बांटने जैसी परंपराएँ उस युग की सांस्कृतिक एकता दिखाती थीं.
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भारतीय इतिहास में मुग़ल काल केवल सत्ता और स्थापत्य कला के लिए ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक समरसता के लिए भी जाना जाता है. दिवाली और गोवर्धन पूजा जैसे हिंदू पर्व भी मुग़ल बादशाहों के दरबारों में पूरे सम्मान और उत्साह के साथ मनाए जाते थे. अकबर से लेकर बहादुर शाह ज़फ़र तक इस परंपरा को राजसी भव्यता के साथ निभाया गया.
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सम्राट अकबर धार्मिक सौहार्द के प्रतीक माने जाते हैं. दिवाली के अवसर पर वे न केवल दीप जलवाते थे, बल्कि गोवर्धन पूजा का विशेष आयोजन करवाते थे. इस दिन अकबर हिंदू वेशभूषा धारण करते और गायों को सजाने की प्रतियोगिता होती थी. सबसे सुंदर गाय सजाने वाले ग्वालों को इनाम दिया जाता था. साथ ही गरीबों को भोजन और वस्त्र दान किए जाते थे.
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जहांगीर ने भी इस परंपरा को आगे बढ़ाया. वे दिवाली पर तांत्रिकों और ज्योतिषाचार्यों को दरबार में बुलाते थे. उनके शासनकाल में यह त्योहार आध्यात्मिक अनुष्ठानों और ज्योतिषीय गणनाओं से जुड़ा हुआ था. दान-दक्षिणा देना और आशीर्वाद प्राप्त करना उस दिन का मुख्य हिस्सा माना जाता था.
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शाहजहां के दौर में दिवाली की चमक और बढ़ गई. फ्रांसीसी यात्री बर्नियर ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि शाहजहाँ के महल में दिवाली की रात दीपों से जगमगा उठती थी. पूरा दरबार रोशनी, संगीत और उल्लास से भर जाता था.
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शाह आलम द्वितीय ने भी इस परंपरा को जारी रखा. उनके शासनकाल में दिवाली के दिन महल को भव्य रूप से सजाया जाता और पूरे दिन पूजा-पाठ और संगीत का माहौल रहता था. यह दिन राजमहल में उत्सव और प्रसन्नता का प्रतीक बन गया था.
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बहादुर शाह ज़फ़र, जो अंतिम मुग़ल सम्राट थे, दिवाली पर खुद को सोने-चांदी के सिक्कों से तौलते और वह धन गरीबों में बांट देते थे. इस दिन बैलगाड़ी सजाने की प्रतियोगिता भी होती थी. उनके दौर में दिवाली न सिर्फ एक धार्मिक उत्सव, बल्कि सामाजिक एकता और दया का प्रतीक बन चुकी थी.
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