Janmashtami 2025: माउंट आबू, जो अपनी प्राकृतिक सुंदरता और शांत माहौल के लिए जाना जाता है, उसका संबंध महान संत मीरा बाई से भी रहा है. शहर से लगभग 12 किलोमीटर दूर, 1450 मीटर की ऊंचाई पर स्थित एक पहाड़ी पर, मीरा बाई ने अपने जीवन के करीब 12 साल भगवान कृष्ण की भक्ति में बिताए थे.
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राजस्थान में कई ऐसे ऐतिहासिक और आध्यात्मिक स्थल हैं जो अपने आप में एक अनूठी कहानी समेटे हुए हैं. उन्हीं कहानियों में से माराबाई की भी गाथा है, जो अपनी अनोखी कृष्ण भक्ति से लिए जानी जाती हैं. कृष्ण भक्त मीरा की आस ऐसी कहानी माउंट आबू से जुड़ी हुई है.
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यह बात 1452 ई. की है, जब महाराणा कुंभा ने माउंट आबू की इसी पहाड़ी पर अचलगढ़ किले का निर्माण करवाया था. उसी दौरान, चित्तौड़गढ़ से मीरा बाई भी यहां आई थीं. उन्हें राजसी महलों की चकाचौंध पसंद नहीं थी, इसलिए उन्होंने किले के पास ही एक साधारण-सी कुटिया में रहकर अपने आराध्य कृष्ण की आराधना की.
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उनकी कुटिया में आज भी एक मंदिर बना हुआ है, जहां उनकी भक्ति की गाथाएं गूंजती हैं. देश-विदेश से आने वाले पर्यटक इस स्थान को देखकर मंत्रमुग्ध हो जाते हैं, जो मीरा के त्याग और समर्पण की कहानी बयां करता है.
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इसी कुटिया के पास, पहाड़ी के ऊपरी हिस्से में एक विशाल कुंड भी है, जिसे श्रावण भादो कुंड के नाम से जाना जाता है. इस कुंड के दो भाग हैं, जिन्हें 'श्रावण' और 'भादो' कहा जाता है. मान्यता है कि यह कुंड कभी नहीं सूखता, और भीषण गर्मी में भी इसमें पानी नजर आता है, मानो मीरा बाई के आंसू आज भी यहां बह रहे हों.
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इस कुंड के पास ही एक प्राचीन चामुंडा माता मंदिर और गोपीचंद की गुफा भी मौजूद हैं, जो इस स्थान के आध्यात्मिक महत्व को और भी बढ़ाती हैं. यह जगह सिर्फ एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि एक ऐसा पवित्र धाम है, जहां मीरा बाई की भक्ति को आज भी महसूस की जा सकती है.
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यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं Zee Rajasthan इसकी पुष्टि नहीं करता हैं