Trending News: वैसे तो दशहरा आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को देश में बड़े हर्षोल्लास से मनाया जाता है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि राजस्थान में एक ऐसा भी गांव है जहां पर दशहरा हर साल 6 महीने तक मनाया जाता है.
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दशहरा
वैसे तो दशहरा आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को देश में बड़े हर्षोल्लास से मनाया जाता है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि राजस्थान की राजधानी जयपुर के रेनवाल क्षेत्र में एक ऐसा गांव है, जहां पर दशहरा हर साल 6 महीने तक मनाया जाता है. जी हां हम बात कर रहे हैं रेनवाल के नांदरी गांव की. जहां पर रावण दहन आश्विन मास की षष्ठी से शुरू होकर वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की दशमी तक होता है. वैसे तो दशहरा आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को देश में बड़े हर्षोल्लास से मनाया जाता है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि राजस्थान की राजधानी जयपुर के रेनवाल क्षेत्र में एक ऐसा गांव है, जहां पर दशहरा हर साल 6 महीने तक मनाया जाता है. जी हां हम बात कर रहे हैं रेनवाल के नांदरी गांव की. जहां पर रावण दहन आश्विन मास की षष्ठी से शुरू होकर वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की दशमी तक होता है.
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बाण का नहीं करते हैं इस्तेमाल
यहां पर होने वाले रावण दहन की खास बात यह है कि यहां पर बाण नहीं बल्कि गोली मारकर रावण का दहन करते हैं. दहन होने वाले रावण का पुतला तकरीबन 40 फीट का होता है. जिसका बड़ी ही रंगीन आतिशबाजी के साथ दहन किया जाता है. स्थानीय लोगों के अनुसार यह परंपरा यहां पर कई वर्षों से चली आ रही है.
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1857 से चल रही है परंपरा
जयपुर जिले के रेनवाल क्षेत्र के नांदरी गांव में वर्षो पुरानी चली आ रही परंपरा के अनुसार रावण के पुतले का दहन किया गया. आतिशबाजी के साथ करीब 40 फीट ऊंचे रावण के पुतले का दहन किया गया. इस मौके पर यहां कई कार्यक्रम आयोजित किए गए. कलाकारों द्वारा कई झांकियां भी सजाई गई थीं. ग्रामीणों के अनुसार यह परंपरा 1857 से चली आ रही है.
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नरसिंह लीला के साथ होता है रावण दहन
वैशाख माह के शुक्ल पक्ष के 10वें दिन रावण के पुतले का दहन किया जाता है. रावण के पुतले के दहन से पहले पुतले के सिर के रूप में रखी रंगीन पानी से भरी मटकी को गोली मारकर फोड़ने की परंपरा है. बताया जाता है कि 1857 में नंदसिंह शेखावत ने नांदरी गांव में सीतारामजी का मंदिर बनवाया था.
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लोगों का लगता है जमावड़ा
जिसके बाद वैशाख माह की दशमी को नरसिंह लीला का आयोजन रखा था. कुछ साल बाद यहां पर नरसिंह लीला और रावण दहन दोनों एक साथ होने लगा. तब से यह परंपरा लगातार निभाई जा रही है. कार्यक्रम में बड़ी संख्या में लोग यहां पहुंचते है और कार्यक्रम का लुत्फ उठाते हैं.