Chittorgarh News: राजस्थान के सांवलिया सेठ मंदिर में लाखों की तादात में भक्त आते हैं, ये भक्त अगर बिजनेस करते हैं तो भगवान को अपना बिजनेस पार्टनर भी मानते हैं. ऐसे में बिजनेस में होने वाले मुनाफे का एक बड़ा हिस्सा दानपात्र में आता है. यहां पर 7 तारीख को मंदिर में कुछ घंटों के लिए पट बंद रहेंगे.
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Sanwaliya Ji temple lunar eclipse
Chittorgarh News: चित्तौड़गढ़ जिले में आगामी 7 सितंबर रविवार को पूर्णिमा के दिन लगने वाले चंद्रग्रहण को देखते हुए सांवलिया जी मंदिर प्रशासन ने दर्शन व्यवस्था में बदलाव किया है. ग्रहण के दिन श्रद्धालु केवल दोपहर 12 बजे तक ही ठाकुर जी के दर्शन कर पाएंगे. इसके बाद मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाएंगे और किसी को भी प्रवेश की अनुमति नहीं होगी.
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मंदिर मंडल की सीईओ प्रभा गौतम ने बताया कि शास्त्रों और परंपराओं के अनुसार, ग्रहण काल में मंदिरों के कपाट बंद रखना जरूरी होता है. इसी वजह से 7 सितंबर को दोपहर बाद से दर्शन बंद रहेंगे और 8 सितंबर की सुबह मंगला आरती के साथ मंदिर में पुनः दर्शन शुरू होंगे.
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भारत में ग्रहण केवल खगोलीय घटना नहीं बल्कि आस्था और परंपरा से जुड़ा एक गहरा विषय माना जाता है. जब भी सूर्यग्रहण या चंद्रग्रहण लगता है, मंदिरों के कपाट बंद कर दिए जाते हैं. यह परंपरा हजारों वर्षों से चली आ रही है और इसके पीछे धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ वैज्ञानिक तर्क भी मौजूद हैं.
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धार्मिक ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि ग्रहण के समय वातावरण में नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव बढ़ जाता है. कहा जाता है कि इस दौरान पूजा-पाठ, हवन या देवदर्शन से शुभ फल प्राप्त नहीं होते. इसी कारण मंदिरों के कपाट बंद कर दिए जाते हैं, ताकि नकारात्मकता देवमूर्ति पर असर न डाले. ग्रहण समाप्त होने के बाद स्नान, शुद्धिकरण और विशेष पूजा-अर्चना कर मंदिरों को पुनः खोला जाता है.
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वैज्ञानिक मानते हैं कि ग्रहण के दौरान वातावरण में अदृश्य किरणों का प्रभाव बढ़ जाता है. इस समय भोजन और जल जल्दी दूषित हो सकते हैं, इसलिए ग्रहण के दौरान भोजन बनाने या खाने से परहेज़ करने की परंपरा बनी. मंदिरों में भी इसी वजह से भोजन-भोग और नियमित गतिविधियां रोक दी जाती हैं.
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ग्रहण को लेकर शास्त्रों में कुछ विशेष नियम बताए गए हैं. इस दौरान लोग साधना, मंत्रजप और ध्यान करने की सलाह देते हैं. माना जाता है कि ग्रहण का समय आध्यात्मिक साधना के लिए अत्यंत फलदायी होता है. कई लोग तुलसी दल या कुशा को भोजन और जल में डालकर उसे सुरक्षित रखते हैं. ग्रहण समाप्त होने के बाद स्नान करके दान करने का भी विशेष महत्व बताया गया है.