Jeen Mata Temple: विश्वप्रसिद्ध खाटूश्यामजी मंदिर से लगभग 28 किलोमीटर की दूरी पर सिद्धपीठ मां जीण भवानी का मंदिर स्थित है. मान्यता है कि खाटूश्यामजी के दर्शन करने आने वाले अधिकांश श्रद्धालु यहां जीण माता के दर्शन के लिए जरूर पहुंचते हैं. राजस्थान के प्रमुख धार्मिक स्थलों में गिने जाने वाले इस मंदिर की कथा बेहद रोचक और चमत्कारिक है.
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Jeen Mata Temple
Jeen Mata Temple: किवदंती के अनुसार, ननद-भोजाई के झगड़े के बाद जीण माता देवी स्वरूप में प्रकट हुईं और उनके भाई हर्ष को भैरव का स्वरूप मिला. मंदिर के पास एक ऊंची पहाड़ी पर जीण माता और हर्ष भैरव दोनों के मंदिर एक साथ बने हुए हैं. कहा जाता है कि यही वह स्थान है, जहां जीण माता ने तपस्या की थी. मंदिर पुजारियों का कहना है कि यहां आज भी माता द्वारा जलाई गई अखंड दिव्य ज्योत प्रज्ज्वलित है.
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Jeen Mata Temple
लोककथाओं और इतिहासकारों के अनुसार, दसवीं सदी में चूरू जिले के घांघू गांव में जन्मे भाई-बहन हर्ष और जीण एक-दूसरे के प्रति अटूट स्नेह रखते थे लेकिन भाभी के षड्यंत्र से आहत होकर जीण माता घर छोड़कर सीकर जिले की अरावली पहाड़ियों में तपस्या के लिए निकल पड़ीं. वे एक ऊंची पहाड़ी चोटी पर बैठ गईं, जिसे बाद में काजल शिखर कहा जाने लगा.
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कहा जाता है कि माता जीण यहां इतना रोईं कि उनके आंसुओं से पूरा पहाड़ भीग गया. इसी कारण इस स्थान को काजल शिखर नाम से जाना जाता है और यह आज भी श्रद्धालुओं के लिए आस्था का बड़ा केंद्र है.
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भाई हर्ष अपनी बहन को मनाने के लिए उनके पीछे-पीछे इस स्थान तक आए. उन्होंने बहन को घर लौटने के लिए कई प्रयास किए लेकिन जीण माता अडिग रहीं और तपस्या में लीन हो गईं. इसके बाद भाई हर्ष ने भी पास की एक दूसरी ऊंची पहाड़ी पर जाकर भगवान शिव की तपस्या शुरू कर दी.
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कहा जाता है कि जब जीण माता ने देखा कि उनका भाई सामने बैठा है तो उन्हें लगा कि उसका दर्शन उनके ध्यान और तपस्या में विघ्न डाल देगा. ऐसे में उन्होंने पास स्थित जयंती माता की ज्योत में छलांग लगा दी और वहीं विलीन हो गईं.
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आज भी मंदिर परिसर में प्रज्ज्वलित इस अखंड ज्योत से भक्त काजल लेकर अपनी आंखों में लगाते हैं. मान्यता है कि इस पवित्र काजल के प्रयोग से नेत्र रोग दूर होते हैं.