70 साल का हुआ संविधान, फिर इसकी मूल भावना के खिलाफ क्यों हो रहा काम?

राजनेताओं की इस पैरवी के बीच सवाल यह है कि अगर राजनैतिक दल संविधान को सर्वोपरि मानते हैं तो फिर भी संविधान की मूल भावना के खिलाफ़ काम क्यों होता है?

70 साल का हुआ संविधान, फिर इसकी मूल भावना के खिलाफ क्यों हो रहा काम?
संविधान दिवस के मौके पर आयोजित गोष्ठी को पूनिया ने संबोधित किया.

जयपुर: भारत का संविधान 70 साल का हो गया है. मंगलवार को देश ने संविधान दिवस मनाया और इसी बीच राजनेताओं ने भी संविधान को सर्वोपरि मानने की पैरवी की है. राजनेताओं की इस पैरवी के बीच सवाल यह है कि अगर राजनैतिक दल संविधान को सर्वोपरि मानते हैं तो फिर भी संविधान की मूल भावना के खिलाफ़ काम क्यों होता है?

संविधान दिवस यूं तो 70 साल से हर बार मनाया जा रहा है लेकिन इस बार का संविधान दिवस कई मायनों में यादगार हो गया. खासतौर से महाराष्ट्र चुनाव के बाद सरकार के गठन और शक्ति परीक्षण के मामले पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के संदर्भ में देखा जाए तो कांग्रेस और एनसीपी इसे संविधान की जीत के रूप में बता रही है. अलबत्ता पार्टी चाहे कोई भी हो, देश का संविधान सभी के लिए है और उसे शब्दों में अपनाने की बजाय उसकी आत्मा का अनुसरण किया जाना चाहिए. यह कहना है उप-मुख्यमंत्री सचिन पायलट का. पायलट ने कहा कि राजनेताओं को भी चाहिए कि वे इस बात का संकल्प लें कि व्यक्तिगत स्वार्थ नहीं, बल्कि संविधान की मूल भावना को ध्यान में रखकर सभी काम किए जाएंगे.

सतीश पूनिया ने कहा- संविधान लोकतंत्र की आत्मा 
उधर अपने आप को दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी बताने वाली बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनिया भी कुछ ऐसा ही मानते हैं. प्रदेश बीजेपी मुख्यालय पर संविधान दिवस के मौके पर आयोजित गोष्ठी को पूनिया ने संबोधित किया. बाद में मीडिया से बात करते हुए उन्होंने संविधान में योगदान के लिए संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद, मौलाना अब्दुल कलाम आजाद, सरदार वल्लभभाई पटेल और भीमराव अंबेडकर को भी याद किया. पूनिया कहते हैं कि हमारा संविधान लोकतंत्र की आत्मा है और इस संविधान पर सभी को गर्व है. संविधान की पालना और उसको सबसे आगे रखे जाने की पैरवी तो सतीश पूनिया भी करते दिखाई दिए.

चाहे कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष और उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट की बात हो या फिर बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनिया की, दोनों ही संविधान को तरजीह देने की बात कर रहे हैं. संविधान को सबसे आगे रखने की बात तो की जा रही है, लेकिन सवाल यह उठता है कि हर चुनाव में एक-दूसरे पर सत्ता के दुरुपयोग, हॉर्स ट्रेडिंग और जातिवाद जैसे आरोप अभी भी क्यों लगते हैं?