जयपुर हेरिटेज नगर निगम चुनाव के नतीजों पर खाचरियावास ने BJP पर किया तंज, कहा...

प्रताप सिंह खाचरियावास लगातार कह रहे थे कि जयपुर हैरिटेज में जनता ने बीजेपी को बहुमत नहीं दिया है, लिहाजा बीजेपी को हैरिटेज में अपना प्रत्याशी ही नहीं उतारना चाहिए.

जयपुर हेरिटेज नगर निगम चुनाव के नतीजों पर खाचरियावास ने BJP पर किया तंज, कहा...
मंत्री प्रताप सिंह खाचरियावास ने बीजेपी पर निशाना साधा है. (फाइल फोटो)

शशि मोहन/जयपुर: नगर निगम के चुनाव के नतीजों में जयपुर ग्रेटर में बीजेपी को स्पष्ट बहुमत मिला, जबकि जयपुर हेरिटेज में महापौर की कुर्सी की चाबी निर्दलीय पार्षदों के हाथ में दिख रही थी. चुनाव नतीजों के बाद से ही कांग्रेस नेता और मंत्री प्रताप सिंह खाचरियावास लगातार कह रहे थे कि जयपुर हैरिटेज में जनता ने बीजेपी को बहुमत नहीं दिया है, लिहाजा बीजेपी को हैरिटेज में अपना प्रत्याशी ही नहीं उतारना चाहिए. जबकि दूसरी तरफ बीजेपी का कहना था कि अगर बीजेपी को बहुमत नहीं मिला है तो कांग्रेस को भी स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है.

अब जयपुर के दोनों नगर निगमों में कांग्रेस और बीजेपी में सीधा मुकाबला होगा. दोनों ही पार्टियों ने दोनों निगम में अपने-अपने प्रत्याशी उतार दिए हैं. संयोग ऐसा भी है कि चार में से तीन प्रत्याशी गुर्जर समाज से हैं. जयपुर हैरिटेज में बीजेपी की कुसुम यादव और कांग्रेस की मुनेश गुर्जर में मुकाबला होगा तो ग्रेटर में बीजेपी की सौम्या गुर्जर और कांग्रेस की दिव्या सिंह में मुकाबला होगा. 

राजधानी के दोनों नगर निगम में आमने-सामने की लड़ाई तो तय हो गई है. लेकिन सवाल यह है कि क्या वाकई में यहां किसी मुकाबले जैसी स्थिति बन भी रही है या नहीं? राजनीति में कई पहलू मायने रखते हैं और उनमें से ही एक पहलू है सामने वाली पार्टी को डराना. कहा जाता है कि आप सामने वाले को हरा पाओ या नहीं, यह दूसरी बात है, लेकिन कम से कम चुनाव और नतीजों तक सामने वाली पार्टी को हार का डर तो दिखाते ही रहना चाहिए, जिससे उनकी मेंटल एक्सरसाइज पूरी होती रहे. ताजा मामले में भी यही दिख रहा है.
 
सबसे पहले बात करते हैं जयपुर हैरिटेज नगर निगम की. कुल 100 पार्षदों वाले इस निगम में कांग्रेस के 47, बीजेपी के 42 और 11 निर्दलीय पार्षद जीते हैं. इनमें से भी 8 निर्दलीय पार्षदों को कांग्रेस पार्टी में शामिल करा लिया गया और कांग्रेस का आंकड़ा 55 पर पहुंच गया. ऐसे में अब सवाल उठता है कि कांग्रेस के 55 पार्षद होने के बाद भी बीजेपी को 100 में से 51 का समर्थन हासिल करने का हौंसला कहां से आ गया?

दरअसल, पार्टी अलग रणनीति पर काम कर रही है, जिसके तहत अलपसंख्यक बनाम गैर-अल्पसंख्यक के समीकरण देखे गए. पार्टी के रणनीतिकारों का मानना है कि अगर कांग्रेस गैर-अल्पसंख्यक वर्ग का प्रत्याशी उतार रही है तो बीजेपी अब अल्पसंख्यक पार्षदों पर फोकस करेगी और इसीलिए रणनीति में राजसमंद सांसद और पूर्व राजपरिवार की सदस्य दिया कुमारी को भी शामिल किया गया है.

हालांकि, प्रदेश में कांग्रेस की सरकार होने के चलते चाहे आर्थिक प्रलोभन की बात हो या बाहुबल के इस्तेमाल की, कांग्रेसी कैंप में सेंधमारी इतनी आसान तो नहीं दिख रही. लेकिन फिर भी बीजेपी अपने विरोधी को मानसिक परेशानी देने के लिए कुसुम यादव पर दांव खेल चुकी है. 

जयपुर ग्रेटर का मामला हैरिटेज के ठीक उलट है. ग्रेटर में 150 पार्षदों के बोर्ड में जादुई आंकड़ा 76 का है और बीजेपी इस फिगर से भी 12 पार्षद ज्यादा जिताकर लाई है. इसके साथ ही बीजेपी महिला मोर्चा की पूर्व जिलाध्यक्ष स्वाति परनामी भी बागी के रूप में जीती हैं. लिहाजा बीजेपी कम्फर्ट जोन में हैं. बीजेपी का यही कम्फर्ट जोन कांग्रेस को रास नहीं आ रहा और इसीलिए 49 पार्षद होने के बाद भी कांग्रेस ने दिव्या सिंह को जयपुर ग्रेटर में महापौर प्रत्याशी बना दिया. बीजेपी को आशंका है कि सत्ताधारी पार्टी होने के नाते कांग्रेस जयपुर ग्रेटर में अपनी ताकत का इस्तेमाल कर सकती है. 

इधर, सौम्या गुर्जर की दावेदारी के बाद शील धाबाई की नाराजगी और उनके पार्टी से बगावत करने की बातें भी सोशल मीडिया पर आने लगीं. लेकिन पार्टी इन चर्चाओं को सिरे से खारिज करती रही. हालांकि, इस बीच पीसीसी चीफ गोविन्द सिंह डोटासरा ने कहा कि हो सकता है कि सभी नगर निगम में कांग्रेस का ही महापौर बन जाए.

वहीं, जयपुर ग्रेटर के बीजेपी सह-प्रभारी रामलाल शर्मा ने भी कहा कि पिछली बार महापौर के उप-चुनाव में विष्णु लाटा प्रकरण भी पार्टी ने ध्यान में रखा है. लिहाजा बीजेपी ने पूरी मुस्तैदी से प्रत्याशी तय किया है और आगे भी पार्टी इसका पूरा ध्यान रखेगी. 

राजनीति में पैंतरेबाजी होती रहती है. लेकिन चुनाव के वक्त सबसे बड़ा पैंतरा अवसरवादिता ही होती है और अगर किसी पार्षद ने इस चुनाव में अवसर ढूंढने की कोशिश की तो वह अपनी पार्टी का सिरदर्द बढ़ा सकता है. लेकिन इसके लिए जरूरी है अवसर देने वाले का अवसरवादी पार्षद से संपर्क और फिलहाल वह तो दोनों ही तरफ से मुश्किल दिख रहा है.