Pratapgarh News: प्रतापगढ़ जिले के सीतामाता अभयारण्य में यह दुर्लभ प्रजाति आपको खुले आसमान में फुर्ती से फिसलती हुई दिख सकती है. अल सुबह या देर शाम इन खास पलों को देखने का सही समय है, जब ये गिलहरियां पेड़ से पेड़ पर फुर्ती से उड़ती नजर आती हैं.
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Pratapgarh News: राजस्थान के आसमान में उड़ती गिलहरियां... जी हां, सही सुना आपने! प्रतापगढ़ के सीतामाता अभयारण्य में दिखीं वो दुर्लभ उड़न गिलहरियां, जो रात के अंधेरे में पेड़ से पेड़ तक हवा में फिसलती हैं. जंगल की ऊंचाइयों से अब आ रही है राहत की खबर, बढ़ी है इनकी संख्या... क्या है इस रहस्यमयी जीव की कहानी?
भूरे रंग वाली यह प्रजाति राजस्थान के साथ गुजरात में भी देखने को मिलती है. यह महुए के पेड़ के साथ तेंदु आदि बड़े पेड़ों पर रहना पसंद करती है. महुए का पेड़ वह पेड़ है जिसके फूलों से शराब बनती है. इस अभयारण्य में यह काफी ज्यादा संख्या में हैं और यहीं कारण है कि यह गिलहरी यहां आसानी से देखी जा सकती हैं. 2018-19 से इनकी संख्या में काफी कमी आने के कारण सभी चिंतित थे, लेकिन इस साल संख्या बढऩे से वन विभाग ने राहत की सांस ली है.
धरियावद रेंज अधीनस्थ वनखंड में वनकर्मी एवं वन सुरक्षा प्रबंध समिति द्वारा वाटर हाल पॉइंट एवं ऊंचे मचान पर बैठकर विभिन्न गणना के संसाधनों के जरिए वन्य जीव की गणना की गई. इस गणना में धरियावद के आरमपुरा में 6 उडऩ गिलहरी दिखाई दी. वन्यजीव प्रेमी मंगल मेहता ने बताया कि उडऩ गिलहरी राजस्थान के दक्षिणी हिस्से के घने जंगलों में पाई गई हैं. सीतामाता अभयारण्य में यह दुर्लभ जीव देखे जाते हैं. इंडियन गेंट फ्लाइंग स्क्विर्रेल उन क्षेत्रों में होती है जहां महुए के पेड़ ज्यादा हो.
राजस्थान के सिर्फ सीतामाता अभ्यारण और फुलवारी की नाल में ही बहुत ज्यादा महुए के पेड़ है. यह वही घर बनाकर रहती है और उसके टहनी के गुदे, फल, पत्ते, कोपल खाती है. इसकी खासियत यह है कि 60 मीटर तक ग्लाइडिंग करती है. उडऩ गिलहरी रात को ही अपने घर से बाहर निकलना पसंद करती है. यह 50 से 60 मीटर की दूरी पर लंबी ग्लाइडिंग करती है. यह पेड़ के शिखर पर जाकर दूसरे पेड़ के बीच में बैलेंस बनाकर ग्लाइड करती है.
इस दौरान वह उसके शरीर पर लगी झिल्लियों को फैला देती है जो उसे ग्लाइड में मदद करती है. यह बाज, लंगूर और दूसरे जानवरों से डरती है. सुबह 4-5 बजे अपने घर लौट आती है और यहीं इन्हें देखने का सबसे अच्छा समय होता है. यह गर्मियों में ज्यादा एक्टिव रहती है जबकि ठंड में यह अपने घर में ज्यादा रहना पसंद करती हैं. जंगलों में यह सिर्फ 4 से 5 साल जीवित रहती है. वजन इनका सिर्फ 1.5 किलो का होता है. पूंछ को मिलाकर इनकी लंबाई 2.5 फीट की होती है.
2017-18 में उडऩ गिलहरी की संख्या 80 पाई गई थी, लेकिन उसके बाद उसकी संख्या लगातार घटती जा रही थी, जिसको देखकर सभी चिंतित थे. 2018-19 में 78 और 2019-20 में यह संख्या और ज्यादा घटकर 58 रह गई थी. खुशी की बात है कि 2020-21 की गणना में 138 उडऩ गिलहरियों की काउंटिंग हुई है. यानी एक साथ 80 गिलहरियों की बढ़ोतरी हुई है. हालांकि इस साल वन्यजीव गणना में सीता माता अभ्यारण्य में हुई गिनती की गणना अभी तक पूरी तरह से सामने नहीं आई है, लेकिन टेरिटोरियल क्षेत्र की गणना में इस बार इनकी संख्या 3 से बढ़ कर 6 दर्ज की गई है.
वन्य जीव प्रेमियों का मानना है कि लगातार करते जंगल और काम होते इनके पर्यावास इनकी संख्या में कमी का एक बहुत बड़ा कारण है. उड़न गिलहरी विशेष रूप से महुआ और तेंदू के बड़े पर पेड़ों पर रहना पसंद करती है, लेकिन अब इन पेड़ों की संख्या में लगातार कमी आती जा रही है जिसके कारण इनका पर्यावास प्रभावित हो रहा है जो इनकी संख्या में कमी का एक बड़ा कारण है.
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