राजस्थान: RU में गर्माया 1 ही फर्म को परीक्षा टेंडर देने का मामला, PMC ने उठाए सवाल

पिछले दिनों राविवि में हुई प्लानिंग मॉनिटरिंग कमेटी की बैठक में भी ये मुद्दा सामना आया जिसके बाद राविवि प्रशासन ने इस मामले में गभीरता बरती.

राजस्थान: RU में गर्माया 1 ही फर्म को परीक्षा टेंडर देने का मामला,  PMC ने उठाए सवाल
यह मामला नए कुलपति के लिए भी बड़ी चुनौती बन गया है.

जयपुर: राजस्थान विश्वविद्यालय (Rajasthan University) की कार्य प्रणाली हमेशा से ही विवादों में रही है और इस बार विवाद है लगातार एक ही फर्म को परीक्षा कार्यों का टेंडर देना. राविवि की ओर से लगातार एक ही परीक्षा फर्म को टेंडर देने के साथ ही अन्य फर्मों को असफल करार देने का मामला राविवि परिसर में छाया हुआ है. पिछले दिनों राविवि में हुई प्लानिंग मॉनिटरिंग कमेटी (PMC) की बैठक में भी ये मुद्दा सामना आया जिसके बाद राविवि प्रशासन ने इस मामले में गभीरता बरती.

दरअसल, राजस्थान यूनिवर्सिटी करीब 7 लाख से ज्यादा विद्यार्थियों की परीक्षा हर साल करवाती है. इन परीक्षाओं का काम यूनिवर्सिटी खुद नहीं करके निजी फर्म को करोड़ों के टेंडर के जरिए सौंपती है. जिसमें परीक्षा के आवेदन, एडमिट कार्ड, परिणाम, मार्कशीट और टीआर तक का काम शामिल होता हैं. लेकिन हर साल परीक्षा कार्यों में गड़बड़ी की शिकायत मिली. लेकिन इसके बाद भी कभी फर्म को बदलने की जहमत नहीं उठाई गई.

वहीं, गोपनीयता होने के कारण विश्वविद्यालय इस फर्म का नाम भी जाहिर नहीं करता हैं. लेकिन अजमेर की इस निजी फर्म को पिछले 6-7 सालों से टेंडर मिल रहा है. हाल ही में एग्जाम प्लानिंग एंड मॉनिटरिंग कमेटी की बैठक में यह मसला गर्माया और कमेटी के पदाधिकारियों ने भी इस पर सवाल खड़े किए, जिसमें यह आपत्तियां सामने आई कि आखिर परीक्षा अनुभाग इसी फर्म को क्यों सबसे उपयुक्त समझता हैं. बाकी फर्म कैसे असफल हो जाती हैं?  

बीते कई सालों में जिन्हें भी परीक्षा कार्यों के लिए टेंडर दिए गए वे असफल करार दे दिए गए या फिर उन्हें बीच सत्र में ही परीक्षाओं का काम छोड़ना पड़ा. जबकि किसी भी फर्म को टेंडर देने से पहले राविवि की तकनीकी कमेटी पूरी फर्म की जांच करके ही ये कामकाज उन्हें सौंपा जाता है. यूनिवर्सिटी लाखों विद्यार्थियों की परीक्षाओं से जो शुल्क वसूलती है. उसमें अपना सिस्टम खुद तैयार कर सकती है. क्योंकि यूनिवर्सिटी के पास इसका अपना स्थाई समाधान है इनफोनेंट सेंटर. लेकिन इसमें स्टाफ और संसाधनों को बढ़ाने की जहमत नहीं उठानी पड़े इसलिए निजी फर्म को ही ठेके पर दे दिया जाता है.

वहीं, टेंडरों में फंसे सिस्टम को किस तरह से सुधारा जा सकेगा यह नए कुलपति के लिए भी बड़ी चुनौती बन गया है. अब जब हाल ही में हुए रिव्यू में ये सब बाते सामने आई हैं तो यूनिवर्सिटी प्रशासन भी इसमें बदलाव की बात कह रहा हैं. खुद ईपीएमसी (EPMC) के संयोजक और यूनिवर्सिटी कुलपति नियमानुसार बदलाव की बात कह रहे हैं.

दरअसल, बीते सालों में दिल्ली की एक निजी फर्म ने भी परीक्षा कार्यो को हाथ में लिया था. लेकिन उसे डेटा उपलब्ध नहीं कराए गए और यूनिवर्सिटी से जुड़े अधिकारियों ने भी सहयोग नहीं किया. ऐसे में वह टेंडर फेल हो गया. इसके पीछे परीक्षा से जुड़े अधिकारियों पर भी सवाल खड़े हुए जिनका जवाब राविवि में किसी के पास नहीं है.