close

खास खबरें सिर्फ आपके लिए...हम खासतौर से आपके लिए कुछ चुनिंदा खबरें लाए हैं. इन्हें सीधे अपने मेलबाक्स में प्राप्त करें.

राजस्थान: सैंकड़ों साल बाद भी गाड़िया लोहार निभा रहे हैं महाराणा प्रताप से किया वादा

 महाराणा की सेना में शामिल गाड़िया लोहारों ने प्रण लिया कि जब तक मेवाड़ मुगलों से आजाद नहीं हो जाता और महाराणा गद्दी पर नहीं बैठते, तब तक हम कहीं भी अपना घर नहीं बनाएंगे

राजस्थान: सैंकड़ों साल बाद भी गाड़िया लोहार निभा रहे हैं महाराणा प्रताप से किया वादा
आज तक अपने प्रण का पालन करते हुए गाड़िया लोहार चितौड़ दुर्ग पर नहीं चढ़े हैं.

प्रवेश परदेशी/प्रतापगढ़: जिनका होता है गाड़ी में घर, वो कहलाते हैं गाड़िया लोहार. बैलगाड़ी इनका घर है और लोहारी इनका पेशा, इसीलिए इनको 'गाड़िया लोहार' के नाम से जाना जाता है. इतिहास प्रसिद्ध गाड़िया लोहार महाराणा प्रताप की सेना के साथ कंधे से कंधे मिलाकर चले थे. प्रताप की सेना के लिए घोड़ों की नाल, तलवार और अन्य हथियार बनाते थे. आज वे दर-दर की ठोकरें खाते हुए एक घुमक्कड़ जिन्दगी बिता रहे हैं.

मेवाड़ में महाराणा प्रताप ने जब मुगलों से लोहा लिया और मेवाड़ मुगलों के कब्जे में आ गया. महाराणा की सेना में शामिल गाड़िया लोहारों ने प्रण लिया कि जब तक मेवाड़ मुगलों से आजाद नहीं हो जाता और महाराणा गद्दी पर नहीं बैठते, तब तक हम कहीं भी अपना घर नहीं बनाएंगे और अपनी मातृभूमि पर नहीं लौटेंगे. तब से आज तक अपने प्रण का पालन करते हुए गाड़िया लोहार चितौड़ दुर्ग पर नहीं चढ़े हैं. 

मेवाड़ भी आजाद हो गया और देश भी, लेकिन ये गाड़िया लोहार आज भी अपने उसी प्रण पर अडिग होकर न तो अपनी मातृभूमि पर लौटे और न ही अपने घर बनाए. भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने गाड़िया लोहार का प्रण तुड़वाने के लिए एक अभियान शुरू किया था, तब कुछ गाड़िया लोहार ने चितौड़ में अपने घर बसाए थे, लेकिन अधिकांश अपने प्रण पर आज भी कायम हैं. सरकार ने भी इन्हें बसाने की कई योजनाएं बनाईं, लेकिन पूरी तरह कारगर साबित नहीं हुई.

घुमक्कड़ जिन्दगी जीने वाले गाड़िया लोहार ने प्रतापगढ़ शहर में ही नहीं, जिले में कई गांव-कस्बों भी अपना डेरा जमा रखा है. यहां सड़क के किनारे इनकी अस्थायी बस्ती बसी हुई है. मिट्टी के पांच-छह फीट ऊंचे कच्चे मकान, दो-चार मवेशी, एक बैल गाड़ी और कुछ लोहा-लक्कड़ यही इनकी संपत्ति है. सर्दी हो या गर्मी या फिर बारिश, यहीं पर इनका डेरा रहता है. शादी-ब्याह हो या कोई पर्व-त्यौहार सब कुछ यहीं सम्पन्न होता है.

लोहे के औजार बनाकर जो कुछ मिलता है, उससे अपना और परिवार का पेट पालते हैं. इनके परिवार की महिलाएं पुरुष से अधिक मेहनती होती हैं. भयंकर गर्मी के दिनों में भी लोहा कूटने का कठोर श्रम करती हैं. और जब जी चाहा ये अपनी बैलगाड़ी लेकर दूसरे ठिकाने पर चल देते हैं. ये लोग कृषि उपकरणों के साथ रसोई में काम आने वाले छोटे-मोटे औजार भी बनाते हैं. परिवार का गुजर बसर करने के लिए ये लोग कड़ी मेहनत करते हैं. पुरुषों के साथ साथ महिलाएं भी अपना पसीना बहाने में पीछे नहीं रहती है. लोहे को कूट-कूट कर उनको औजार का रूप देना और बाजार में बेचना, यही इनकी आजीविका का साधन है.  

देश आजाद हुए आज 70 साल से ज्यादा बीत गए हैं. सरकार ने इन लोगों के लिए कई योजनाएं बनाई, लेकिन उन योजनाओं का कितना लाभ इन लोगों तक पहुंचा, इनकी हालत को देख कर साफ पता चलता है. स्वयं सेवी संस्थाओं को आगे आकर इनकी सोच में परिवर्तन लाना चाहिए, समाज की मुख्य धारा से जोड़ने के लिए इन्हें समझाने की जरूरत है कि ठहराव से ही विकास संभव है. सरकार को इनके आवास और अन्य मूलभूत सुविधाओं के लिए भरसक प्रयास करने की जरूरत है.