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राजस्थान: उम्मीवारों के चयन में जातिगत समीकरण को ध्यान में रख, सभी दलों ने खेला दांव

नमो नारायण मीणा दो बार सांसद रह चुके हैं. साल 2009 में मीणा ने इसी सीट पर गुर्जर आरक्षण आंदोलन के अगुआ रहे कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला को नजदीकी मुकाबले में हराया था

राजस्थान: उम्मीवारों के चयन में जातिगत समीकरण को ध्यान में रख, सभी दलों ने खेला दांव
फाइल फोटो

जयपुर: राजस्थान की जयपुर सीट पर लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की ज्योति खंडेलवाल और बीजेपी के रामचरण बोहरा में सीधा मुकाबला होगा. यहां के जातिगत समीकरणों को देखते हुए बीजेपी की टिकट घोषित होने के बाद कांग्रेस ने वैश्य समाज से आने वाली ज्योति खंडेलवाल पर दांव खेला है. 

जयपुर के जातिगत समीकरणों की बात करें तो तकरीबन 4:30 से 5 लाख के बीच ब्राह्मण वोटर्स हैं और इतनी ही आबादी वैश्य समाज से आने वाले मतदाताओं की है. करीब साढ़े तीन लाख मुस्लिम मतदाता हैं. यहां तकरीबन 4:30 लाख मतदाता अनुसूचित जाति जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग से आते हैं. इसके अलावा एक लाख से कुछ ज्यादा राजपूत समाज के वोट और इतने ही सिंधी पंजाबी समुदाय के वोटर हैं. अब दोनों ही पार्टियों की कोशिश इस मुकाबले को ब्राह्मण बनाम वैश्य बनाने की हो सकती है.

टोंक-सवाई माधोपुर से पूर्व केंद्रीय मंत्री नमोनारायण और मौजूदा सांसद सुखबीर सिंह जौनपुरिया के बीच सीधा मुकाबला होगा. कांग्रेस का टिकट आने वाले नमो नारायण तो मीणा समाज से आते हैं जबकि सुखबीर जौनपुरिया गुर्जर समाज से आते हैं. यहां भी दोनों पार्टियों ने अपने अपने नजरिए से जातिगत समीकरण देखकर उन्हें साधने की कोशिश की है. टोंक-सवाई माधोपुर संसदीय क्षेत्र की सोशल इंजीनियरिंग की बात करें तो यहां गुर्जर, मीणा मुस्लिम, माली और जाट मतदाता डिसाइडिंग फैक्टर हैं. इसके साथ ही अनुसूचित जाति के वोटर भी यहां बड़ी संख्या में है.

नमो नारायण मीणा दो बार सांसद रह चुके हैं. साल 2009 में मीणा ने इसी सीट पर गुर्जर आरक्षण आंदोलन के अगुआ रहे कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला को नजदीकी मुकाबले में हराया था. सीकर संसदीय क्षेत्र में कांग्रेस के सुभाष महरिया और बीजेपी के सुमेधानंद सरस्वती के बीच सीधा मुकाबला होता दिख रहा है. दोनों की टिकट तय होने के बाद कार्यकर्ताओं में उत्साह है. सुमेधानंद सरस्वती भले ही धार्मिक प्रवृत्ति के हैं और सन्यासी हों लेकिन पिछले चुनाव में बड़ी जीत दर्ज कर उन्होंने अपनी स्वीकार्यता दिखा दी थी. 

सुभाष महरिया ने भी पिछला चुनाव निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में लड़ा था और वे तीसरे नंबर पर रहे थे. उसके बाद से ही कांग्रेस की तरफ उनका झुकाव होने लग गया था. जब मेहरिया ने कांग्रेस ज्वाइन की तभी यह तय हो गया था कि उन्हें सीकर से टिकट दिया जाएगा. राजनेता के रूप में सीकर में मेहरिया की स्वीकार्यता भी है और इसीलिए पार्टी ने उन्हें यहां से टिकट दिया है. सीकर परंपरागत रूप से जाट सीट रही है. यहां दोनों ही प्रत्याशी जाट समाज से हैं.