राजस्थान सरकार की अनदेखी का शिकार हुआ 'बास्केटबॉल', खिलाड़ियों को नहीं मिल रहा सही नेतृत्व

मौजूदा दौर में जूनियर, सब जूनियर में तो टीमें बेहतर प्रदर्शन कर मैडल प्राप्त कर रही हैं लेकिन सीनियर टीम में आने के साथ ही खिलाड़ी राजस्थान छोड़ अन्य प्रदेशों की ओर खेलने के लिए पलायन करते हैं.

राजस्थान सरकार की अनदेखी का शिकार हुआ 'बास्केटबॉल', खिलाड़ियों को नहीं मिल रहा सही नेतृत्व
राज्य खेल होने के बाद भी पिछले 23 सालों से राजस्थान की सीनियर टीम कोई पदक हासिल नहीं कर पाई है

जयपुर: विश्व के टॉप-10 खेलों की जब बात आती है तो 7वें नम्बर पर बास्केटबॉल का नाम आता है और पूरी दुनिया में बास्केटबॉल की दिवानगी देखते ही बनती है. इस खेल के प्रति दिवानगी रखने वाले राजस्थान के खिलाड़ियों की अनदेखी का आलाम यह है कि बीते 23 सालों में राजस्थान की झोली में एक पदक तक नहीं आ पाया है.

राजस्थान का राज्य खेल होने के बाद भी पिछले 23 सालों से राजस्थान की सीनियर टीम कोई पदक हासिल नहीं कर पाई है. संसाधानों की कमी हो या फिर अंतर्राष्ट्रीय स्तर के कोच या फिर खिलाड़ियों के लिए सरकारी नौकरी हर क्षेत्र में राजस्थान पिछड़ा हुआ ही नजर आता है. जिसके चलते राजस्थान के खिलाड़ी ऐसे में 1996 के समय में राजस्थान की शान माना जाने वाले इस खेल की स्थिति आज चिंताजनक है.

1996 से पहले की अगर बात की जाए तो राजस्थान का स्टेट खेल बास्केटबॉल हर क्षेत्र में छाया रहता था और राष्ट्रीय स्तर की स्पर्धाओं में हर साल राजस्थान की धाक रहती थी और ये स्वर्णिम दौर चला वर्ष 1970 से 1996 तक लेकिन 1996 के बाद से ही सरकार और खेल विभाग की अनदेखी के चलते इस खेल पर ऐसी नजर लगी कि लगातार ये खेल राजस्थान में गर्त में ही जाता रहा है. एक समय मैडल्स का ढेर लगाने वाला राजस्थान आज एक मैडल तक के लिए तरस रहा है.

राजस्थान से अर्जुन अवार्डी हनुमान सिंह, जोरावर सिंह, परमजीत सिंह, बलदेव सिंह ओमप्रकाश, राधेश्याम जैसे अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ी निकले है. जिन्होंने इस खेल में प्रदेश का नाम बुलंदियों तक पहुंचाया. यहां से निकल कर भारतीय टीम में पहुंचे कई खिलाड़ियों ने देश का नाम भी रोशन किया है. मौजूदा दौर में जूनियर, सब जूनियर में तो टीमें बेहतर प्रदर्शन कर मैडल प्राप्त कर रही हैं लेकिन सीनियर टीम में आने के साथ ही खिलाड़ी राजस्थान छोड़ अन्य प्रदेशों की ओर खेलने के लिए पलायन करते हैं और इसकी मुख्य वजह है बेहतर प्रशिक्षण, पर्याप्त सुविधाएं और सरकारी नौकरी को लेकर अनदेखी.

ये हालात सिर्फ पुरुष बास्केटबॉल टीम के ही नहीं है. महिला बास्केटबॉल टीम के हालात तो इससे भी बूरे हैं. सिर्फ जयपुर तक सिमटे महिला बास्केटबॉल के हालात ये हैं कि महिला बास्केटबॉल में महिला खिलाड़ियों की लम्बाई पर्याप्त नहीं होने की वजह से दूसरे टीमें इन पर भारी पड़ती है. वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में कोई एकेडमी नहीं होने की वजह से ग्रामीण क्षेत्र से खिलाड़ियों की खोज नहीं हो पा रही है. जिसका खामियाजा इस स्टेट टीम को भुगतना पड़ रहा है.

राजस्थान बास्केटबॉल टीम के पूर्व कप्तान दानवीर सिंह का कहना है कि 23 साल पहले ये खेल जहां था आज भी वहीं का वहीं है. राजस्थान में 33 जिले होने के बाद भी महज 3 अकेडमी हैं. वहीं इन एकेडमी में भी 38 कोच की जरुरत है लेकिन काम चल रहा है महज 8 कोच से. ऐसे में ये खेल लगातार गर्त में जा रहा है.