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Rajsamand News: जिले के पिपलांत्री क्षेत्र से इस समय एक बड़ी और संवेदनशील खबर सामने आ रही है. यहां एक धार्मिक स्थल को हटाए जाने को लेकर स्थानीय लोगों में भारी नाराजगी देखने को मिल रही है. प्रशासन की इस कार्रवाई के विरोध में लोगों ने आवाज बुलंद की है, वहीं पूरे घटनाक्रम से जुड़े वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे हैं, जिससे मामला और ज्यादा तूल पकड़ता जा रहा है.
बताया जा रहा है कि पिपलांत्री क्षेत्र में स्थित एक स्कूल के ग्राउंड में बने धार्मिक स्थल को हाल ही में प्रशासन की ओर से हटाया गया. इस कार्रवाई के बाद स्थानीय लोगों में रोष फैल गया और बड़ी संख्या में लोग इसका विरोध करने लगे. लोगों का कहना है कि इस तरह की कार्रवाई करते समय जनभावनाओं को नजरअंदाज किया गया, जिससे समाज की धार्मिक आस्था को ठेस पहुंची है.
भीम आर्मी भारत एकता मिशन राजस्थान ने किया विरोध
मामले को लेकर भीम आर्मी भारत एकता मिशन राजस्थान ने कड़ा विरोध जताया है. संगठन के प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य ईश्वरलाल सालवी ने प्रशासन की कार्रवाई पर सवाल खड़े करते हुए कहा कि बिना स्थानीय लोगों की भावनाओं और संवेदनशीलता को ध्यान में रखे इस तरह की कार्रवाई करना गलत है. उन्होंने कहा कि प्रशासन को किसी भी कदम से पहले जनप्रतिनिधियों और स्थानीय समाज से संवाद करना चाहिए था, ताकि किसी तरह का विवाद उत्पन्न न होता.
क्या है पूरा मामला
जानकारी के अनुसार, यह पूरा मामला कुछ दिन पहले दर्ज कराई गई एक शिकायत से जुड़ा है. बताया गया है कि एक व्यक्ति ने स्कूल के ग्राउंड में धार्मिक स्थल बनाए जाने को लेकर आपत्ति जताई थी. इस संबंध में शिकायत शिक्षा मंत्री मदन दिलावर से की गई थी, जो हाल ही में पिपलांत्री क्षेत्र के दौरे पर आए थे. शिकायत मिलने के बाद प्रशासन ने मामले की जांच की और उसके बाद कार्रवाई करते हुए धार्मिक स्थल को हटाने का निर्णय लिया.
लोगों में नाराजगी देखी जा रही
प्रशासन की इस कार्रवाई के बाद से ही क्षेत्र में तनाव का माहौल बना हुआ है. हालांकि फिलहाल स्थिति नियंत्रण में बताई जा रही है, लेकिन लोगों में नाराजगी साफ तौर पर देखी जा रही है. सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो में लोग प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी करते नजर आ रहे हैं और धार्मिक स्थल हटाने के फैसले को वापस लेने की मांग कर रहे हैं.
क्या है स्थानीय लोगों का कहना
स्थानीय लोगों का कहना है कि धार्मिक स्थल लंबे समय से वहां मौजूद था और इसे हटाने से पहले किसी तरह की सार्वजनिक सुनवाई या चर्चा नहीं की गई. वहीं, विरोध कर रहे संगठनों का यह भी कहना है कि शिक्षा संस्थान और धार्मिक आस्था, दोनों के बीच संतुलन बनाकर समाधान निकाला जाना चाहिए था.
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