उदयपुर: लेकसिटी में क्यों कांग्रेस नहीं बना पाई अपना बोर्ड, यहां जानिए वजह

राजनैतिक विश्लेषक हेमेन्द्र चंडालिया की मानें तो इसके पीछे कई कारण रहे हैं, जिसमें मुख्य रूप से पार्टी के नताओं के बीच में आपसी सामंजस्य की कमी और गुटबाजी रही है. 

उदयपुर: लेकसिटी में क्यों कांग्रेस नहीं बना पाई अपना बोर्ड, यहां जानिए वजह
80 और 90 के दशक तक उदयपुर में कांग्रेस का डंका बजता रहा.

उदयपुर: प्रदेश को 18 साल तक मुख्यमंत्री देने वाला उदयपुर शहर कभी कांग्रेस पार्टी का गढ़ हुआ करता था. कांग्रेस के मजबूत पंजे ने शहर में कमल को खिलने नहीं दिया लेकिन पिछले कुछ दशकों में समय ने करवट बदली.
यहां कांग्रेस का मजबूत पंजा कमजोर हुआ और लेकसिटी के चुनावी मैदान में कमल के खिलने का क्रम शुरू हुआ जो वर्तमान समय में भी बदस्तूर जारी है. आलम यह है कि तमाम प्रयास के बाद भी कांग्रेस शहर के निगम तक में अपना बोर्ड नहीं बना पाई है.

लेकसिटी उदयपुर से चुनावी जीत दर्ज कर लगातार 18 साल तक सूबे के मुख्यमंत्री रहे मोहनलाल सुखाड़िया के शहर में कांग्रेस इतनी कमजोर हो जाएगी, शायद किसी ने सपने में भी नहीं ऐसा नहीं सोचा होगा. प्रदेश में लोकतांत्रित प्रक्रिया शुरू होने के साथ ही उदयपुर सहित पूरे मेवाड़ संभाग में कांग्रेस मजबूती के साथ आगे बढ़ी. 80 और 90 के दशक तक उदयपुर में कांग्रेस का डंका बजता रहा. पंचायत से लेकर संसद तक के चुनाव में पार्टी बड़ी ही आसानी से जीत दर्ज कर लेती लेकिन पिछले कुछ दशकों में कांग्रेस पार्टी कमजोर होती गई.

लगातार हार का सामना करना पड़ा
आलम तो यह है कि कांग्रेस पार्टी उदयपुर शहर में इतनी कमजोर हो गई कि पिछले चार विधानसभा, दो लोकसभा और अब तक हुए सभी छ निकाय चुनावों में पार्टी को एक के बाद एक हार का सामना करना पड़ा. राजनैतिक विश्लेषक हेमेन्द्र चंडालिया की मानें तो इसके पीछे कई कारण रहे हैं, जिसमें मुख्य रूप से पार्टी के नताओं के बीच में आपसी सामंजस्य की कमी और गुटबाजी रही है. यही नहीं, इस दौरान जब भी कांग्रेस पार्टी विपक्ष में रही तो वह जतना के मुद्दों को उठाने में सफल नहीं हो पाई. यही नहीं, इस दौरान कांग्रसे पार्टी के अन्य संगठन भी जनता में अपनी पकड़ को बनाए रखने में सफल नहीं हो पाए, जिससे पार्टी को इस स्थिति में पहुंचना पड़ा.

तीन पार्षद ही नगर निगम में पहुंचने में सफल हो पाए
बहरहाल पार्टी के नेता भी मानते हैं कि पिछले कुछ सालों से उदयपुर शहर में कांग्रेस कमजोर हुई है, इसके पीछे कई खामियां भी रही हैं. वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव और हाल ही में हुए निकाय चुनाव के बाद कांग्रेस पार्टी के नेताओं के हौसले कुछ बुलंद जरूर हुए हैं हालाकि इन चुनावों में भी कांग्रेस पार्टी को हार का सामना करना पड़ा लेकिन पार्टी का वोट प्रतिशत जरूर बढा है. वर्ष 2013 के विधानसभा चुनाव में जहां भाजपा प्रत्याशी गुलाबचन्द कटारिया करीब 25 हजार वोट से जीत थे. साथ ही 2014 के निकाय चुनाव में भी कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा और पार्टी के महज तीन पार्षद ही नगर निगम में पहुंचने में सफल हो पाए.

2018 के विधानसभा चुनाव में कटारिया की जीत का अंतर महज 9 हजार वोट रह गया और गत महा हुए निकाय चुनाव में भी कांग्रेस पार्टी के पार्षदों की संख्या तीन से बढ के 20 हो गई. पार्टी पदाधिकारियों की मानें तो ये दोनों चुनाव परिणाम उदयपुर शहर में वेटिलेटर पर पडी कांग्रेस पार्टी के लिए वरदान साबीत हो सकते हैं. बावजूद इसके पार्टी अपनी हार की समीक्षा कर कमियों को दूर करने का प्रयास कर रही है.