मेवाड़ में वन्यजीवों को रास आया अभयारण्य, दुगुने हुए चीतल और सांभर

जिले के जयसमंद अभयारण्य में पिछले एक साल में सांभर और चितर की संख्या दुगुनी हो गई है.

मेवाड़ में वन्यजीवों को रास आया अभयारण्य, दुगुने हुए चीतल और सांभर
अभयारण्य में सांभर की आबादी की सटीक स्थिति प्रदान करेगी.

अविनाश जगनावत, उदयपुर: हरी-भरी अरावली पहाड़ियों के बीच और नीली झीलों के पास बसे उदयपुर शहर की मनमोहक छटा सात समंदर पार से आने वाले सैलानियों को तो अपनी ओर आकर्षित करती ही है. लगता है कि अब यहां का आबो हवा और मौसम एक बार फिर वन्य जीवों को भी भाने लगा है. यही कारण है कि जिले के जयसमंद अभयारण्य में पिछले एक साल में सांभर और चितर की संख्या दुगुनी हो गई है.

दरअसल, पिछले कुछ वर्षों से इस इलाके में वन क्षेत्र की संख्या में कमी होने और अनुकूल वातावरण उपलब्ध नहीं होने के कारण यहां से वन्यजीव विलुप्त होने लगे थे. ऐसे में उदयपुर वन विभाग की ओर से वन क्षेत्र में विलुप्त हो रहे वन्यजीवों के संरक्षण और उनके सफल पुनर्वास को लेकर अनूठा प्रयास शुरू किया गया है, जिसके तहत उदयपुर में वन विभाग के अधिकारियों की ओर से तीन प्रयास जिले के शुरू किए गए, जिनमें से एक प्रयास का एक वर्ष इसी माह में ही पूर्ण होने जा रहा है. विभाग को अपने इन प्रयास में कई सार्थक परिणाम भी मिले हैं.

जयसमंद अभयारण्य में हुई थी पुनर्वास की कवायद
उदयपुर शहर से लगभग पचास किलोमीटर दूर 50 वर्ग किलोमीटर में फैले जयसमंद वन्यजीव अभयारण्य कभी 1950 में अधिसूचित किया गया था. यह क्षेत्र कभी मेवाड़ राज्य के तत्कालीन महाराणाओं के लिए खेल रिजर्व था. मेवाड़ के महाराणा द्वारा की जाने वाली वार्षिक बाघ शूटिंग इस रिजर्व से शुरू होती थी. गेम रिजर्व होने वाला क्षेत्र वन्यजीवों से समृद्ध था. यहां टाइगर, पैंथर, हाइना, भेडि़या, सियार, जंगली बिल्ली, जंगली सूअर, चिंकारा, सांभर, चित्तीदार हिरण और अन्य जानवर शामिल थे. आजादी के बाद, कई कारणों से, इस रिजर्व में टाइगर के साथ अन्य वन्यजीवों में भारी गिरावट देखी गई. 

हालात तो यह हो गए कि इस अभयारण्य में सांभर और चीतल पूरी तरह से समाप्त हो गए और केवल कुछ चिंकारा और नील गाय ही बचे थे. इन स्थितियों में चीतल और सांभर के पुनर्वास के लिए तत्कालीन मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) राहुल भटनागर ने यहां पर लुप्तप्राय हो चुके चीतल और सांभर का पुनर्वास का प्रयास शुरू किया.

18 चीतल और 23 सांभर का हुआ पुनर्वास
पुनर्वास की पहल के सूत्रधार रहे राहुल भटनागर ने बताया कि वे वर्ष 1984 से लगातार जयसमंद अभयारण्य में जाते रहे हैं. परंतु यहां कभी भी चीतल और सांभर की साईटिंग नहीं हुई. इन जीवों के लिए अनुकूल क्षेत्र में इनकी गैर मौजूदगी दुःखद थी. इसी को लेकर एक कार्ययोजना बनाई गई, जिसमें वर्ष 2014 में 18 चीतल और वर्ष 2017 और 2019 में 23 सांभर इस अभयारण्य में पुनर्वास के लिए मुक्त किए गए. उन्होंने बताया कि 2 सितंबर 2014 को शिकाराबाड़ी मिनी चिडि़याघर से 18 चीतल (10 नर और 8 मादा) को तथा 30 अप्रैल 2017 से 7 मई 2017 तक के बैच में 5 सांभर (2 नर और 3 मादा) को दिल्ली गोल्फ कोर्स से तथा 10 सांभर (3 नर और 7 मादा) को 11 मई 2019 को और 8 सांभर (3 नर और 5 मादा) को 18 मई 2019 को दिल्ली चिडि़याघर से जयसमंद अभयारण्य में लाया गया.

वन्यजीवों को छोड़ने से पहले पुख्ता किए बंदोबस्त
भटनागर ने बताया कि इन सभी वन्यजीवों को यहां अभयारण्य में मुक्त करने के लिए केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण के निर्देशों के अनुरूप पहले 21 दिन क्वारंटाइन में रखा गया. इसके लिए जयसमंद अभयारण्य स्थित डिमड़ा बाग में पुनर्वास केंद्र स्थापित किया गया. जीवों को यहां रखने की समस्त व्यवस्थाएं पुख्ता की गई. अभयारण्य में पैंथर्स की बड़ी संख्या को देखते हुए पुनर्वास केंद्र को पैंथर प्रूफिंग किया गया. 

शिफ्ट किए गए वन्यजीवों के लिए वॉटरहॉल बनाए गए और सांभर के लिए पुनर्वास केंद्र के अंदर बाड़ा भी बनाया गया. वन्यजीवों को स्थानांतरित करने से दो महीने पहले, पैच में हरा चारा भी उगाया गया और बाड़े में इनके लिए झाडि़यां और छायादार वृक्ष भी थे. इन समस्त वन्यजीवों को इस क्षेत्र के साथ अनुकूलन बनाने के लिए भोजन, पानी इत्यादि की निर्देशानुसार व्यवस्था की गई और डिमड़ा बाग पुनर्वास केंद्र में 21 दिन रखने के बाद जंगल में मुक्त कर दिया गया.  

इस टीम के प्रयासों ने दिलाई सफलता
चीतल और सांभर के पुनर्वासों के प्रयास तत्कालीन मुख्य वन संरक्षक राहुल भटनागर के नेतृत्व में विभाग के कई अधिकारियों और कार्मिकों की मेहनत का परिणाम है. इस टीम में वन्यजीव विशेषज्ञ और पर्यावरण विज्ञानी डॉ. सतीश शर्मा, पशु चिकित्साधिकारी डॉ. प्रदीप प्रधान, तत्कालीन उप वन संरक्षक टी मोहनराज, सहायक वन संरक्षक केसरसिंह राठौड़, तत्कालीन रेंजर गणेश गोठवाल, शूटर सतनामसिंह, फारेस्टर लालसिंह और वाहन चालक मांगीदास के साथ विभाग के अन्य कार्मिक थे.

पांच साल में लगभग दोगुने हुए चीतल
भटनागर बताते हैं कि वर्ष 2010 से 2014 की वन्यजीव गणना में चीतल की मौजूदगी नहीं देखी गई, वहीं वर्ष 2018 व 2019 की वन्यजीव गणना के आंकड़ों में इस अभयारण्य में 32 चीतल देखे गए हैं. इधर, सांभर के बारे में जयसमंद अभयारण्य के रेंजर गौतमलाल मीणा की रिपोर्ट के अनुसार, अभयारण्य में दो नए जन्में और 15-16 सांभर के दो झुंड जंगली में नियमित रूप से देखे जाते हैं. 

यह भी उल्लेखनीय है कि 2019 की वॉटर हॉल वन्यजीव गणना के अनुसार, जयसमंद वन्यजीव अभयारण्य में 13 पैंथर्स देखे गए हैं, जो इंगित करता है कि सांभरों ने नए परिवेश में खुद को अच्छी तरह से ढाल लिया है और इस प्रकार पुनः उत्पादन सफल है. इधर, वर्ष 2020 के लिए वॉटर हॉल वन्यजीव गणना 5 जून 2020 को निर्धारित है जो कि अभयारण्य में सांभर की आबादी की सटीक स्थिति प्रदान करेगी.

चीतल और सांभर की आबादी में बढ़ोत्तरी सुखद है
मुख्य वन संरक्षक वन्यजीव आर के सिंह की मानें तो जयसमंद अभयारण्य जैव विविधता की दृष्टि से समृद्ध है. वन विभाग द्वारा इसमें चीतल और सांभर के पुनर्वास के प्रयास किए गए थे और इनकी आबादी भी बढ़ी है, यह सुखद है. चीतल की संख्या में बढ़ोत्तरी तो गत वर्षों में हुई वन्यजीव गणना में दर्ज हुई है परंतु गत वर्ष मुक्त किए गए सांभर की संख्या तो उप वन संरक्षक अजीत ऊंचोई के निर्देशन में इस अभयारण्य में 5 जून को होने वाली गणना में ही प्राप्त हो सकेगी.