Rajasthan News: राजस्थान में बाघों की संख्या में तेजी से वृद्धि हो रही है. प्रदेश के सभी पांच टाईगर रिजर्व में बाघों का आंकड़ा 150 के पार पहुंच गया है.
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Rajasthan News: राजस्थान में बाघों की संख्या में तेजी से वृद्धि हो रही है. प्रदेश के सभी पांच टाईगर रिजर्व में बाघों का आंकड़ा 150 के पार पहुंच गया है. सबसे अधिक बाघ प्रदेश के सबसे बड़े रणथंभौर टाईगर रिजर्व में है ,यहाँ बाघों की संख्या 82 पहुंच गई है.
मरुधरा में तेजी से बढ़ती बाघों की संख्या में रणथंभौर का विशेष योगदान रहा है. रणथंभौर की ही बदौलत सूबे के सभी टाईगर रिजर्व बाघों से आबाद है और यहाँ निरंतर बाघों की संख्या में तेजी से इज़ाफा हो रहा है, जो राज्य सरकार एंव वन विभाग के साथ ही वन्यजीव प्रेमियों के लिए खुशी की खबर है.
राजस्थान में करीब 20 साल पूर्व जहाँ बाघों का अस्तित्व पूरी तरह से संकट में था और प्रदेश में महज 18 से 20 ही बाघ बचे थे. अब मरुधरा बाघों का गढ़ बनता जा रहा है. प्रदेश में बाघों का आंकड़ा 150 के पार पहुंच गया है और यह आंकड़ा तेजी से बढ़ रहा है. विगत कुछ महीनों में ही राजस्थान के टाईगर रिजर्व में दो दर्जन से भी अधिक टाईगर शावकों ने जन्म लिया है और आगामी एक दो सालों में यह आंकड़ा 50 के पार पहुंचने की संभावना है.
प्रदेश के सभी पांच टाईगर रिजर्व में वयस्क बाघ-बाघिनों की संख्या 120 के करीब है. अकेले रणथंभौर में ही वयस्क बाघ बाघिनों की संख्या 50 के करीब है. वहीं शावकों की संख्या करीब 32 है , ऐसे में रणथंभौर में प्रदेश के 150 मेसे आधे से अधिक बाघ बाघिन ओर शावक है.
एक रिपोर्ट के मुताबक रणथंभौर में वर्तमान में 82 बाघ बाघिन और शावक है. सरिस्का में 49 ,मुकुंदरा में 2 ,करौली धौलपुर में 10 ,रामगढ़ विषधारी में 7 बाघ बाघिन ओर शावकों की संख्या है. राजस्थान में विगत कुछ सालों में बाघों की संख्या में 8 से 9 गुना तेजी से वृद्धि हुई है ,जो अपने आप मे बेहद सुखद है. सूबे में तेजी से बढ़ती बाघों की संख्या को लेकर रणथंभौर के वन्यजीव विशेषज्ञ डॉक्टर धर्मेंद्र खांडल का कहना है कि प्रदेश में बाघों की तेजी से वृद्धि में राज्य सरकार और वन विभाग की महत्वपूर्ण भूमिका रही है.
सरकार ने जहाँ अपने स्तर पर अनेक प्रयास किये वही वन विभाग के अधिकारी कर्मचारियों ने भी भरपूर मेहनत की है और वन विभाग के बेहतर मैनेजमेंट और मॉनिटरिंग की बदौलत ही प्रदेश में बाघों की संख्या में इजाफा हुवा है ,जो एक सराहनीय कदम है. साथ ही डॉक्टर धर्मेंद्र खांडल कहते है कि बाघों की संख्या में 8 से 9 गुना वृद्धि हुई है.
प्रदेश में बाघों के संरक्षण को लेकर जंगल का दायरा भी बढ़ा है. भलेही जंगल के दायरे की वृद्धि बाघों की संख्या में वृद्धि की अपेक्षा 4 से 5 फीसदी ही हुई है, लेकिन वृद्धि जरूर हुई है. डॉक्टर खांडल का कहना है कि हमने जिस तरह से बाघों की संख्या में वृद्धि हो रही है. उस लिहाज से वन क्षेत्र में जो इजाफा हुवा है वो मुफीद नहीं है.
अभी भी प्रदेश के कई टाईगर रिजर्व में आबादी है जो बाघों के लिहाज़ से बिल्कुल भी सुरक्षित नहीं है. सरकार को जल्द कोई ठोस कदम उठाते हुवे टाईगर रिजर्व क्षेत्रो से गांवों के विस्थापन की प्रक्रिया में तेजी लानी चाहिए ,ताकि बाघों को पर्याप्त प्रयायवास मिल सके. विशेषकर रणथंभौर ओर सरिस्का सहित अन्य टाईगर रिजर्व से गांवों का विस्थापन करना बेहद जरूरी हो गया है.
प्रदेश में बढ़ती बाघों की संख्या में रणथंभौर का विशेष योगदान है ,एक समय ऐसा था कि सरिस्का बाघ विहीन हो गया था ,तब रणथंभौर से ही बाघ सरिस्का भेजे गए थे आज सरिस्का में 49 से अधिक बाघ बाघिन और शावक है ,सरिस्का के साथ ही मुकुंदरा और रामगढ़ विषधारी टाईगर रिजर्व को आबाद करने में भी रणथंभौर का ही योगदान है. वैसे तो रणथंभौर का इतिहास गौरवशाली रहा है.
कभी रणथंभौर के जंगलों में राजा-महाराजा शिकार के लिए आते थे और यह जंगल राजा महाराजाओं के लिए शिकारगाह था. केंद्र सरकार ने 1955 में रणथंभौर को पहली टाईगर गेम सेंचुरी घोषित किया था और फिर 1973 में ''प्रोजेक्ट टाइगर'' के तहत सरकार ने इसे संरक्षित क्षेत्र घोषित कर दिया गया. रणथंभौर 1334 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फेंला हुवा है ,लेकिन इसके 939.14 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में ही बाघों का विचरण क्षेत्र है.
आज रणथंभौर में 82 से अधिक बाघ, बाघिन और शावक हैं. इनमें से करीब 25 बाघ रणथंभौर के पहले 5 जोन ,जो कि ''क्रिटिकल टाइगर हैबिटेट'' में विचरण करते है. इस क्षेत्रों में मलिक तालाब, राजबाग और पदम तालाब जैसे प्राकृतिक जल स्रोतों के कारण अधिकांश वाइल्डलाइफ मूवमेंट होता है. शेष बाघ बाघिन और शावक रणथंभौर के अन्य बाकी के 5 जोनों में विचरण कर रहे है. वहीं प्रदेश का दूसरा सरिस्का टाईगर रिजर्व करीब 866 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है, जहाँ वर्तमान में करीब 49 बाघ बाघिन और शावक विचरण कर रहे है.
वहीं तीसरा मुकुंदरा हिल्स टाईगर रिजर्व 760 वर्ग किलोमीटर में है ,इसके अलावा रामगढ़ विषधारी , धौलपुर- करौली टाईगर रिजर्व है. रणथंभौर में बाघों की बढ़ती संख्या को लेकर वन्यजीव विशेषज्ञ डॉक्टर धर्मेंद्र खांडल का कहना है कि रणथंभौर में तेजी से बढ़ती बाघों की संख्या के पीछे वन विभाग की मेहनत के साथ ही बाघ संरक्षण के क्षेत्र में काम करने वाले लोगो की भूमिका भी अहभ रही है. यहाँ के लोग बाघ संरक्षण को लेकर बेहद जागरूक है ओर रणथंभौर से गांवों का विस्थापन भी तेजी से हुवा है ,उनका कहना है कि अब हमें भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी और बाघों के संरक्षण को लेकर जरूरी कदम उठाने होंगे.
प्रदेश के अन्य टाईगर रिजर्व के आस पास के लोगो को बाघ संरक्षण को लेकर जागरूक करना होगा ,रणथंभौर में बाघों का संरक्षण तेजी से हुवा है ,जिसकी बदौलत ना सिर्फ रणथंभौर में बाघों की संख्या में वृद्धि हुई है बल्कि पर्यटन भी बढ़ा है. उनका कहना है कि रणथंभौर की तरह ही अन्य टाईगर रिजर्व से सरकार और वन विभाग को लोगों को तैयार कर गाँवो का विस्थापन करने की प्रक्रिया तेज करनी चाहिए ताकि बाघों का संरक्षण हो सके ओर आगामी दिनों में ओर भी तेजी से बाघों की संख्या में वृद्धि हो सके.
प्रदेश में बढ़ती बाघों की संख्या वन्यजीव प्रेमियों और सरकार व वन विभाग के लिए सुखद खबर है ,लेकिन सरकार और वन विभाग की जिम्मेदारी भी उतनी ही बढ़ गई है, जिसनी तेजी से बाघों की संख्या में वृद्धि हो रही है. उतनी ही तेजी से बाघों की मॉनिटरिंग और संरक्षण पर ध्यान देना होगा ,ताकि आगामी दिनों में बाघ मानव संघर्ष ना बढ़े और बाघों के बीच भी अपने अस्तित्व एंव टेरेटरी को लेकर आपसी टकराव ना हो ,इसके लिए सरकार और वन विभाग को मिलकर कोई ठोस प्लान बनाते हुवे टाईगर रिजर्व में बसे गाँवो के विस्थापन की प्रक्रिया को तेज करना चाहिए , साथ ही आमजन को भी बाघ संरक्षण को लेकर जागरूक करना चाहिए ,ताकि आमजन बाघों के महत्व को समझ सके.