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3 माह में पूरी नहीं हुई घोटाले की जांच, MBS अस्‍पताल प्रशासन पर चहेतों को बचाने का आरोप

जी मीडिया ने एमबीएस हॉस्पिटल में लिक्विड शॉप विद डिस्पेंसर (डिटोल/लाइफबॉय) खरीद में घोटाले का खुलासा किया था.

3 माह में पूरी नहीं हुई घोटाले की जांच, MBS अस्‍पताल प्रशासन पर चहेतों को बचाने का आरोप

मुकेश सोनी / कोटा : कोटा के एमबीएस अस्‍पताल में सामान की खरीद में हुए घोटाले की जांच अभी तक पूरी नहीं हो सकी है. मामले की जांच में हो रही लेटलतीफी के चलते अस्‍पताल प्रशासन पर चहेतों को बचाने का आरोप लग रहा है. अस्‍पताल प्रशासन पर आरोप यह भी है कि वह कागजों पर कमेटियां बनाकर इस मामले को निपटाने में लगा हुआ है.

बता दें कि जी मीडिया ने एमबीएस हॉस्पिटल में लिक्विड शॉप विद डिस्पेंसर (डिटोल/लाइफबॉय) खरीद में घोटाले का खुलासा किया था. खुलासे के बाद अस्पताल प्रशासन ने मामले की जांच के लिए तीन सदस्य कमेटी बनाई थी. जिसमें अस्पताल उपाधीक्षक डॉ. समीर टंडन, डॉ. करनेश गोयल और सीनियर एकाउंटेंट राकेश भारती शामिल थे. 3 माह का लंबा अंतराल बीत जाने के बावजूद यह कमेटी यह भी पता नहीं कर सकी है कि डिटॉल व लाइफबॉय की दो साल पहले की बाजार कीमत क्‍या है.

ये था मामला
अस्पताल में लोकल टेंडर के तहत जनरल आइटम की सप्लाई के लिए साल 2017 में ऑनलाइन निविदा जारी की थी.जिसमें लिक्विड शॉप विद डिस्पेंसर (डिटोल/लाइफबॉय) प्रति 200 एमएल की दर 135 रुपये अनुमोदित की गई थी. हालांकि यह बात दीगर है कि बाजार में इस लिक्विड शॉप का खुदरा मूल्य85 से 100 रुपये था. अस्पताल प्रशासन की आरसी के मुताबिक सप्लायर फर्म को जनवरी में वर्क ऑर्डर जारी किए थे. इस ऑर्डर पर फर्म ने माल की सप्लाई भी कर दी थी. इस दौरान अस्पताल के ही एक एकाउंटेंट ने आरसी ( रेट कॉन्ट्रेक्ट/दर) पर सवाल उठा दिये थे और फर्म का भुगतान रोक दिया था. जिसके बाद, सप्लायर फर्म ने बाबुओं परकमीशन मांगने का आरोप लगाते हुए अधीक्षक को लिखित में शिकायत दी थी.

जिम्‍मेदारों ने भी नहीं लिया एक्शन
आरोप है कि भ्रष्टाचारी गठजोड़ के कारण एमबीएस अस्‍पताल में बाजार दर से ज्यादा मूल्य पर डिटॉल व लाइफबॉय की खरीद की गई. जिसके चलते, सरकार को राजस्व की हानि हुई. मामला सामने आने के बाद भी जिम्‍मेदारों ने आंखे मूंद ली. उल्‍लेखनीय है कि मेडिकल कॉलेज में घोटाले व भ्रष्टाचार के मामलों की जांच के लिए "चीफ विजिलेंस ऑफिसर" भी नियुक्त है. खुद मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य इसके मुखिया है. आरोप है कि घोटाले के कई मामले सामने आने के बाद भी पिछले एक साल में एक भी मामले की जांच चीफ विजिलेंस ऑफिसर कर पाए. आरोप है कि इधर, एमबी अधीक्षक ने दबाव के चलते मजबूरी में प्रशासनिक ब्लॉक में कार्यरत कुछ बाबुओं के प्रभार में बदलाव किया, लेकिन उनका एजेंडा बदस्तूर जारी रहा.

जांच कमेटी में शामिल सीनियर अकॉन्टेन्ट राकेश भारती का कहना है कि मामले में पार्टली (अलग-अलग फेज) जांच चल रही है.हमने फर्म से पूछा है कि बाजार दर से ज्यादा पर सप्लाई कर सकता है या नही. उस समय पर लिक्विड शॉप विद डिस्पेंसर (डिटोल/लाइफबॉय) प्रति 200 एमएल की बाजार क्या दर थी,जब आरसी एप्रवुड हुई थी. जांच के दायरे में परचेज कमेटी सहित सभी शामिलहोंगे.हम चाह रहे है कि ऐसा सॉलिड ग्राउंड बनाकर दे,जिसमें आगे जांच की गुंजाइश नही रहे, इसलिए विलंब हो रहा है.