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राजस्थान यूनिवर्सिटी में 6 साल तक नहीं हुए थे छात्रसंघ चुनाव, जानें इसकी पूरी कहानी

राजस्थान विश्वविद्यालय में छात्र राजनीति की शुरूआत 1967 में हुई और उसके बाद से ही छात्र राजनीति में धनबल और बाहुबल हावी होता गया.

राजस्थान यूनिवर्सिटी में 6 साल तक नहीं हुए थे छात्रसंघ चुनाव, जानें इसकी पूरी कहानी
साल 2010 में एक बार फिर से छात्रसंघ चुनाव की शुरूआत हुई.

जयपुर: छात्र राजनीति मुख्य राजनीति में प्रवेश की पहली सीढ़ी मानी जाती है, लेकिन ये पहली सीढ़ी ही इतनी मैली होती गई की छात्र राजनीति प्रतिस्पर्धा को छोड़ धनबल और बाहुबल के रास्ते पर चली गई. यह स्थिति इतनी बढ़ गई कि आखिरकार अदालत को इसमें हस्तक्षेप करते हुए वर्ष 2005-06 में रोक लगानी पड़ी. जब वर्ष 2010-11 में फिर से छात्रसंघ चुनाव की शुरूआत हुई तो इन छात्र संगठनों और छात्र नेताओं पर लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों का डंडा चला था .

राजस्थान विश्वविद्यालय में छात्र राजनीति की शुरूआत 1967 में हुई और उसके बाद से ही छात्र राजनीति में धनबल और बाहुबल हावी होता गया. वक्त से साथ ये लगातार बढ़ता ही गई. वर्ष 2000 से 2004 के बीच ये इतना ज्यादा बढ़ गया की राजस्थान हाईकोर्ट को इसमें हस्तक्षेप करना पड़ा. हाईकोर्ट ने सुनवाई करते हुए वर्ष 2005-06 में छात्रसंघ चुनावों में रोक लगा दी. उसके बाद करीब 6 सालों तक छात्रसंघ चुनावों को लेकर गहन मंथन के बाद लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों के साथ साल 2010 में एक बार फिर से छात्रसंघ चुनाव की शुरूआत हुई. इन सिफारिशों के आधार पर छात्र संगठनों पर धनबल और बाहुबल पर तो रोक लगी ही साथ ही पूरा छात्रसंघ चुनाव भी 5 हजार रुपये में लड़ने की बाध्यता भी की.

वर्ष 2010 में जब 5 हजार की बाध्यता का नियम लागू किया तो वहीं छात्र संगठनों ने इसका पूरजोर तरीके से विरोध भी किया. समय समय पर इस राशि को 50 हजार रुपये करने को लेकर कई बार उच्च शिक्षा विभाग, मुख्यमंत्री तक को गुहार लगाई गई, लेकिन सरकार अपने आदेश पर कायम रही. वहीं आज भी इस बाध्यता का भारी विरोध होता है. पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष अनिल चौपड़ा का कहना है कि सब जानते हैं की छात्रसंघ चुनाव 5 हजार रुपये में नहीं लड़ा जा सकता है. चुनाव कैसे लड़ा जाता है ये भी सब जानते हैं. वहीं दूसरी ओर एनएसयूआई की ओर से पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष अनिल चोपड़ा ने कहा कि 5 हजार रुपये की सीमा को बढ़ाने के लिए कई बार मांग की गई है, लेकिन कोई सुनवाई नहीं होती है. ऐसे में इस बार पैनल के जीतने पर इस राशि को बढ़ाने के पूरे प्रयास रहेंगे.

वहीं दूसरी ओर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की ओर से 5 हजार रुपये की राशि बाध्यता को लेकर बयानो में विरोधाभास देखने को मिले. एबीवीपी के छात्र नेता शंकर गोरा का कहना है कि 5 हजार रुपये में क्या राजस्थान यूनिवर्सिटी प्रशासन चुनाव करवा देती है, जो छात्र नेताओं पर ये बाध्यता लगाई गई है. ऐसे में एक बार फिर से चुनावी खर्चों पर विचार कर इसमें संशोधन करना चाहिए. वहीं एबीवीपी की ओर से छात्रसंघ अध्यक्ष रहे राजेश मीणा का कहना है कि जब से 5 हजार रुपये की बाध्यता लागू हुई है तब से एबीवीपी 5 हजार में ही चुनाव लड़ती आई है और आगे भी लड़ती रहेगी.

बहरहाल, लिंगदोह कमेटी की सिफारिशें छात्रसंघ चुनाव में लागू तो हो गई है, लेकिन इन सिफारिशों का पालना कहां तक होता है ये लिंगदोह कमेटी, सरकार और राजस्थान यूनिवर्सिटी भी अच्छी तरह से जानती है. उसके बाद भी समय-समय पर इस राशि बढ़ोतरी होने की मांग हर बार उठती है.