बाड़ाबंदी में पार्षदों की खातिरदारी में नेताओं की लंबे से कट रही जेब,जानिए कैसे ?

निकाय चुनाव के नतीजों के बाद चेयरमैन की कुर्सी के लिए जिन पार्टियों को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है.पार्षदों की बाड़ेबन्दी हो रही है.इतना ही नहीं रेट भी तय हो रहा है. लेकिन सबसे बड़ा सवाल कि आखिर इस सारे खर्चे का बिल किसके नाम कटेगा ?

बाड़ाबंदी में पार्षदों की खातिरदारी में नेताओं की लंबे से कट रही जेब,जानिए कैसे ?
कुर्सी के लिए मशक्कत

शशि मोहन, जयपुर: निकाय चुनाव के नतीजों के बाद चेयरमैन की कुर्सी के लिए मशक्कत चल रही है असल में इस कुर्सी पर भी शायद उतनी कील नहीं लगती होंगी. जितने पेंच इस कुर्सी पर बैठने के लिए कसने पड़ रहे हैं. दरअसल यह सारी कवायद उन निकायों में ज्यादा हो रही है. जहां पर किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है.पार्षदों की बाड़ेबन्दी हो रही है. इतना ही नहीं रेट भी तय हो रहा है. लेकिन सबसे बड़ा सवाल कि आखिर इस सारे खर्चे का बिल किसके नाम कटेगा ?
माना पैसा खुदा नहीं है. पर खुदा की कसम खुदा से कम भी नहीं है.पैसे को लेकर कही गई इन चन्द लाइनों से पैसे की अहमियत अपने आप ज़ाहिर हो जाती है.यहां तक की लक्ष्मी पूजन के मौके पर होने वाली मां लक्ष्मी की आरती में भी कुछ ऐसी ही पंक्तियां आती हैं.जो कहती हैं.तुम बिन यज्ञ न होते, वस्त्र न कोई, पाता खान-पान का वैभव सब तुमसे आता. इसी आरती में गाया जाता है कि लक्ष्मी है तो सब संभव हो जाता, मन नहीं घबराता.इसके अलावा लक्ष्मी की अहमियत देखनी हो तो निकाय चुनाव के नतीजों के बाद निर्दलीय पार्षदों के भाव सुनकर उसे जाना जा सकता है. चेयरमैन बनने की जद्दोजहद में इसे देखा जा सकता है. चेयरमैन की कुर्सी ऐसी है कि पालिका , परिषद और निगम में मुखिया बनने के लिए नेता कुछ भी करने को तैयार हैं. 
कुछ समय पहले लोकसभा चुनाव लड़ चुके एक नेताजी भी निकाय के मुखिया बनना चाहते हैं इसके लिए वे भी पैसे की जुगत लगा रहे हैं. हालत यह है कि जयपुर के त्रिवेणी नगर में इन नेताजी का एक बड़ा प्लॉट है और नेताजी ने इस प्लॉट की बिकवाली निकाल दी है.एक अनुमान के मुताबिक इस प्लॉट की बिक्री से उनके पास तकरीबन चालीस करोड़ रुपए आएंगे. जिसमें से कुछ रकम कथित तौर पर पार्षदों का वोट खरीदने के लिए दी जाएगी.चेयरमैन के लिए चुनाव 26 नवम्बर को होना है.लेकिन तब तक अपने खेमे के पार्षदों को सुरक्षित जगह पर रखना और उन्हें टूटने से बचाने का बड़ा ज़िम्मा भी नेताओं के कंधों पर है. लिहाजा 26 के चुनाव तक पार्षदों को अच्छे होटल में रुकवाया जा रहा है. खातिरदारी की जा रही है.ऊपर से वोट के साथ जुहारी दी जाएगी सो अलग. अलबत्ता इतना खर्चा तो हो रहा है.लेकिन इसका बिल किसके नाम कटेगा? इस सवाल पर कांग्रेस नेता खामोश हैं.
लेकिन यही सवाल बीजेपी के प्रदेशाध्यक्ष सतीश पूनियां से हुआ तो उन्होंने स्वीकारोक्ति करते हुए कहा कि पार्टी के पार्षदों में कोई सेंधमारी नहीं कर सके इसलिए सभी पार्षदों को एक जगह ठहराने को कहा गया है. उन्होंने कहा कि इसकी ज़िम्मेदारी पार्टी और उसके नेताओं की होती है.बीजेपी ने तो नेताओं को ज़िम्मेदारी दे दी और नेता भी पार्षदों की सहूलियत का पूरा ध्यान रख रहे हैं लेकिन सवाल यह है कि आखिर इस पूरे खर्चे का बिल कौन भुगतेगा ? इस सवाल पर सतीश पूनियां ने कहा कि सांसद, विधायक, चेयरमैन, ज़िलाध्यक्ष और समन्वयक को इस बारे में व्यवस्था करनी होती है. पूनिया ने सीधे तौर पर किसी एक के मत्थे यह पूरा खर्चा नहीं मढ़ने की बात कही पार्षदों के ठहरने-खाने और उनकी सुविधाओं पर होने वाले खर्च के साथ ही चेयरमैन की कुर्सी के लिए बहुमत का आंकड़ा जुटाने में भी कई बार प्रत्याशी को खर्चा करना होता है . ऐसे में पार्षदों को किये जाने वाले कथित भुगतान का खर्चा भी इसमें जुड़ता है. निकाय चुनाव के नतीजे आने से पहले चेयरमैन के दावेदारों के नाम यह खर्चा था. लेकिन कई जगह से प्रत्याशी के पार्षद चुनाव में ही हार जाने के बाद उसका नाम खर्चे वाली लिस्ट से काट दिया गया है. बाड़ेबन्दी से बाहर आने वाले ऐसे ही पार्षद अब राहत की सांस लेते हुए कह रहे हैं कि अच्छा हुआ जो चुनाव हार गए वरना खर्च इतना ज्यादा था कि उसका रिटर्न वापस लेने और कर्जदारों का पैसा चुकाने में भी पसीने आ जाते 
जनप्रतिनिधियों की इन बातों के बीच ही सवाल उठ रहे हैं कि अगर सभापति, चेयरमैन और महापौर बनने से पहले ही पार्षदों को इतने पापड़ बेलने पड़ रहे हैं तो चुनाव से पहले होने वाले खर्चे का रिटर्न वे कहां से निकालेंगे ? और अगर रिटर्न निकाल भी लिया तो क्या ऐसे मुखिया अपने निकाय में विकास के कोई काम भी करा पाएंगे या नहीं ?