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जयपुर: रंग लाई वन विभाग की मेहनत, 72000 देशी बबूल के पेड़ बने पर्यावरण के रक्षक

13 वर्ष के वन विभाग के अथक प्रयास से आज 260 बीघा जमीन पर करीब 72000 देशी बबूल पेड़ बनकर पर्यावरण के संतुलन को बनाए रखनें का कार्य कर रहे है.

जयपुर: रंग लाई वन विभाग की मेहनत, 72000 देशी बबूल के पेड़ बने पर्यावरण के रक्षक
वर्तमान में 70 प्रतिशत पौधे बनकर पेड़ का रूप ले चुके हैं

जयपुर: एक तरफ जहां हर तरफ पेड़ो की अंधा-धुंध कटाई कर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने का कार्य हो रहा है, वहीं दूसरी जयपुर जिले के रेनवाल कस्बे के नजदीकी मुंडली-रणजीतपुरा पंचायत के खारडा की चारागाह जमीन पर देशी बबूल हरियाली फैला रहे है. क्षारीय जमीन जहां पेड़-पौधों तो क्या घास भी लगना मुश्किल है, लेकिन लगातार 13 वर्ष के वन विभाग के अथक प्रयास से आज 260 बीघा जमीन पर करीब 72000 देशी बबूल पेड़ बनकर पर्यावरण के संतुलन को बनाए रखनें का कार्य कर रहे है.

रेनवाल से करड-काकंरा सड़क मार्ग से जब कोई गुजरता है तब उसे खारड़े की भूमि में बबूल के पेडों की हरियाली देखकर कुछ पल रूकने का मन करता है. मुंडली-रणजीतपुरा पंचायत के लोगों ने ग्राम विकास समिति बनाकर वनविभाग के सहयोग से खारड़ा की क्षारीय भूमि पर पौधे लगानें का काम वर्ष 2006 में किया था. वनविभाग ने राजस्थान वानकी एवं जैव विविधता प्रयोजना (आरएफबीपी) में जायका द्वारा फंडेड योजना के तहत वर्ष 2006 में 88 बीघा जमीन पर 17600 पौधे देशी बबूल के लगाए गए थे.

वहीं साल वर्ष 2007 में 60 बीघा जमीन पर 12000 पौधे लगाए थे. जिनमें वर्तमान में 70 प्रतिशत पौधे बनकर पेड़ का रूप ले चुके हैं और हरियाली फैला रहे हैं. वर्ष 2014 में 140 बीघा जमीन पर 25000 पौधे लगाए गए तथा वर्ष 2015 में 72 बीघा भूमि पर 14400 पौधे लगाए गए है. पौधों में पानी की पूर्ति बारिश से जमा पानी से होती है. खारड़ा क्षेत्र की उक्त जमीन चारागाह भूमि है, जो पहले रेनवाल नगरपालिका के अधीन थी. लेकिन सात वर्ष पूर्व मुंडली-रणजीतपुरा पंचायत के गठन के बाद अब पंचायत के अधीन है.

पौधे लगानें में बालू मिट्टी लेते है काम में वन विभाग के वृक्षपालक विक्रम सिंह राजावत ने बताया कि सबसे पहले चिन्हित जमीन जहां पौधे लगानें है. वहां चारों तरफ फेन्सिग करवाई जाती है. पानी को रोकने के लिए मिट्टी की ट्रेन्जे तैयार की जाती है. ट्रेन्जों में जहां बारिश का पानी रूकता है, वहीं 12माह जमीन में नमी बनी रहती है. उसके बाद पौधे लगानें के लिए अलग-अलग गड्ढे खोदे जाते है, जिनमें बालू मिटटी डलवाई जाती है. 

इसके साथ ही बारिश के बाद गड्डों में देशी बबूल लगाए जाते है. पौधों की सुरक्षा के लिए सुरक्षा गार्ड लगाया जाता है. समय-समय पर पौधों की निराई गुडाई की जाती है. पौधों को पांच वर्ष तक सुरक्षा करनें के बाद पेड़ बननें पर पंचायत को सुपर्द कर दिया जाता है. उसके बाद पंचायत पेडों की सार संभाल करती है.