ये मूर्तिकार निर्जीव पत्थर में भी फूंक दे जान, दुनिया भर में हैं मशहूर

राजस्थान की मूर्तिकला की पहचान यहां के दस्तकारों की बेजोड़ कारीगरी की बदौलत दुनिया भर में अपनी अलग पहचान रखती है.

ये मूर्तिकार निर्जीव पत्थर में भी फूंक दे जान, दुनिया भर में हैं मशहूर
इस गांव तक आने वाला कोई भी रास्ता सुगम नहीं है यहां 3 दर्जन से ज्यादा ऐसे कारखाने है.

हनुमान तंवर, नागौर: राजस्थान की मूर्तिकला की पहचान यहां के दस्तकारों की बेजोड़ कारीगरी की बदौलत दुनिया भर में अपनी अलग पहचान रखती है. यहां के मूर्तिकार अपनी कला के जरिये निर्जीव पत्थर में भी जान फूंक देते हैं. नागौर जिले के नावां उपखण्ड का भूणी गांव एक ऐसा गांव है जहां के कई परिवार मूर्तिकला से जुड़े हुए हैं, लेकिन इन परिवारों के सामने कई ऐसी समस्यायें हैं जिनका समाधान हो जाये तो यह मूर्तिकार अपनी कला का लोहा दुनिया भर में मनवा सकते हैं. 

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अरावली की तलहटी में बसा नागौर जिले के नावां उपखण्ड का भूणी गांव जिला मुख्यालय से करीब 150 किलोमीटर दूर है. एक समय था जब इन पहाड़ियों से निकलने वाले पत्थरों को तराश कर घट्टियाँ (पत्थर की हाथ से चलने वाली चक्की) बनाई जाती थी जिसकी दूर दूर तक पहचान थी. समय बदला और हाथ वाली घाटियों का स्थान आधुनिक आटा चक्कियों ने ले लिया. जीवन यापन पर संकट आया तो स्थानीय पत्थर का स्थान मार्बल और महंगे पत्थरों ने ले लिया और घट्टी का स्थान ले लिया मूर्तियों ने बीते दो दशक में यहां के मूर्तिकारों ने देशभर में हजारों मूर्तियां बनाई और कई मूर्तियां तो ऐसी है जो अपने आप में अद्वितीय है. इस गांव के मूर्तिकारों के हाथों में जैसे कोई जादू है जो एक पत्थर में जान देते हैं. 

यहां की बेजोड़ मूर्तिकला का कोई सानी नहीं है. मूर्तिकार अपनी जी जान लगाकर मूर्तियां तैयार करते हैं, लेकिम इन मूर्तिकारों का एक दर्द यह है कि यहां की मूर्तिकला की अलग पहचान आज तक नहीं बन पाई है. जिसकी वजह यह है कि इस गांव तक आने वाला कोई भी रास्ता सुगम नहीं है यहां 3 दर्जन से ज्यादा ऐसे कारखाने है. जहां तकरीबन 150 से 200 मजदूर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इस उद्योग से जुड़े हुए हैं, लेकिन इन लोगों की सीधे सीधे कोई पहचान नहीं है बल्कि मकराना और किशनगढ़ जैसे क्षेत्रों के दलालों के जरिये ही ऑर्डर यहां आते हैं. सीधे कस्टमर की पहुंच इस क्षेत्र में नहीं होने की वजह से इन लोगों को को फायदा मिलना चाहिए वो नहीं मिल पाया है.

स्थानीय लोगों और मूर्तिकारों का कहना है कि चुनावों के वक्त यहां नेता आते हैं हर बार लोक लुभावन वफाओं के साथ वोट लेते हैं, लेकिन हमारी जरूरतों और वादों की तरफ मुड़कर कोई वापस नहीं देखता. अधिकारी भी इन गांवों में आने से कतराते हैं. मूर्तियां बनाने के लिए बिजली की सबसे ज्यादा आवश्यकता होती है लेकिन 24 घण्टों में बमुश्किल 6 घण्टे बिजली आपूर्ति यहां होती है जिसकी वजह से समय पर ऑर्डर भी पूरे नहीं किये जा सकते.

अगर सरकार और प्रशासन इन दस्तकारों को पूरी सुविधाएं मुहैया करवाएं तो भूणी गांव की अपनक अलग पहचान कायम हो सकती है और याचना के दस्तकारों की अलग पहचान बन सकती है, लेकिन सरकारी अनदेखी की वजह से यह गांव अपनी पहचान का मोहताज है.

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