अपनी बदहाली पर रो रही हनुमानगढ़ की ये ऐतिहासिक धरोहर

सन 1805 में बीकानेर के राजा सूरत सिंह ने यह किला भाटियों से जीता था और उस दिन मंगलवार होने के कारण इसका नाम हनुमान जी के नाम पर हनुमानगढ़ रखा गया था.

अपनी बदहाली पर रो रही हनुमानगढ़ की ये ऐतिहासिक धरोहर

हनुमानगढ़: कभी भारत के मजबूत किलों में से गिने जाने वाले भटनेर किले ने यूं तो कई आक्रमण सहे और राजाओं के राजपाट देखे पर रखरखाव के नाम पर हो रहे भ्रष्टाचार के आक्रमण को ये किला सहन नहीं कर पाया और रखरखाव के आभाव में किला जर्जर होकर गिरने के कगार पर है. 52 बीघा क्षेत्र में 52 बुर्जियों सहित निर्मित भटनेर किले की एक बुर्जी बरसात के कारण गिरने के साथ इसकी अंदर कि स्तिथि भी ठीक नहीं है. 

मुख्य द्वार ताक ढहने की कगार पर है जिसक चलते द्वार को लोहे कि पाईपों के सहारे खड़ा कर रखा है. किले के आसपास बनी बसी के लोगों में भी भय है कि कभी भी इसकी दीवारें गिर सकती है और कोई बड़ी दुर्घटना हो सकती है. इससे किले में आने वाले लोगों को भी खतरा है और बाहर बसी बस्तियों के लोग भी डर महसूस कर रहे हैं कि किले की दीवारें उनके घरों पर ना आ गिरें. 

सन 1805 में बीकानेर के राजा सूरत सिंह ने यह किला भाटियों से जीता था और उस दिन मंगलवार होने के कारण इसका नाम हनुमान जी के नाम पर हनुमानगढ़ रखा गया था. इस किले के बारे में तैमुर ने अपनी जीवनी तुजुके तैमुर में इसे हिंदुस्तान का सबसे मजबूत किला कहा था क्योंकि रक्षक ही स्थान पर खड़ा रहकर तीन स्थानों पर लड़ाई लड़ सकता है. किले के जर्जर होकर गिरने के पीछे बड़ा कारण भ्रष्टाचार बताया जा रहा है. इस किले के रखरखाव के नाम पर सरकार ने करोड़ों रुपए खर्च किए परन्तु असल में ये खर्च सिर्फ कागजों में ही सीमित रह गया. बुर्जी गिरने की सुचना मिलने पर पुरातत्व विभाग के अधिकारीयों ने भी मौके का जायजा लिया था और स्तिथि को गम्भीर पाया था लेकिन इसके जीर्णोधार के लिए कुछ नहीं किया गया.

खंडहर खुद बयां करते हैं कि ये ईमारत कभी बुलंद थी. निश्चित तौर पर हमारी एतिहासिक धरोहर को बचाने के जितने प्रयास किए जाने चाहिए थे नहीं किए गए जिससे ये हालात बने है, हालंकि, तत्कालीन जिला कलेक्टर टी रविकांत के समय में इस दुर्ग को बचाने के प्रयास किए गए. दुर्ग के उपर पार्क का निर्माण भी करवाया गया. यहां स्वतन्त्रता दिवस जैसे कार्यक्रम मनाने का प्रस्ताव भी रखा गया मगर जर्जर हालात देख प्रस्ताव पास न हो पाया. वर्तमान में कुछ प्रयास किए जा रहे हैं इसे बचाने के लेकिन वे उतने कारगर नहीं जितने होने चाहिए. देखना होगा कि पुरातत्व विभाग और सरकार कब इस दुर्ग के बारे में सोचते हैं.