देश में आया डिजिटल युग लेकिन कोटा के इस गांव को मूलभूत सुविधाओं का आज भी इंतजार

इस गांव तक पहुंचना भी बहुत मुश्किल है क्योंकि यहां पहुंचने के लिए पहाड़ चढ़ना पड़ता है. कोटा से मंड़ाना होते हुए रावठा गांव तक 43 किलोमीटर गाड़ी से पहुंचने के बाद आगे गाड़ी का रास्ता नहीं होता. 

देश में आया डिजिटल युग लेकिन कोटा के इस गांव को मूलभूत सुविधाओं का आज भी इंतजार

कोटा: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जुलाई में जयपुर में कहा था कि न्यू इंडिया का निर्माण न्यू राजस्थान से ही होगा, लेकिन कोटा के एक गांव की हकीकत उन्हें चौंका देगी कोटा से करीब 55 किमी. दूर स्थित गांव दामोदरपुरा आजादी के 71 साल बाद भी सड़क, बिजली, चिकित्सा और शिक्षा जैसी मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहा है. 91 परिवारों का यह गांव चारों तरफ से पहाड़ियों से घिरा हुआ है. इसके अलावा ये मुकंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व एरिया में आता है, इस कारण यहां सड़क नहीं बन पा रही है और परिवारों की जिंदगी पहाड़ी में कैद होकर रह गई है. विकास के दावे की सच्चाई ये है कि गांव में आज तक किसी ने डॉक्टर नहीं देखा है. सड़क आज तक बनी नहीं ग्रामीणों का कहना है कि गांव में आज तक सड़क नहीं बनी है. 

इस गांव तक पहुंचना भी बहुत मुश्किल है क्योंकि यहां पहुंचने के लिए पहाड़ चढ़ना पड़ता है. कोटा से मंड़ाना होते हुए रावठा गांव तक 43 किलोमीटर गाड़ी से पहुंचने के बाद आगे गाड़ी का रास्ता नहीं होता. आगे की राह मुश्किल है लेकिन दामोदरपूरा गांव के लोग हर रोज झेलते हैं. करीब 12 किलोमीटर पहाड़ वाले पथरीले बिलकुल टूटे फूटे खतरनाक रास्ते से इस गांव पर पहुंचा जाता है.

गांव में बिजली की भी है समस्या
गांव में बिजली नहीं है. वहीं इस गांव में इलेक्ट्रोनिक्स का भी कोई उपकरण नहीं है. किसी घर में आपको न पंखा मिलेगा न कोई ट्यूबलाइट. एजुकेशन सिटी, स्मार्ट सिटी से 55 किलोमीटर दूर इस गांव ने आजादी के बाद से अब तक बिजली को नहीं देखा. हाथो में मोबाइल जरूर है लेकिन नेटवर्क नहीं. मोबाइल को चार्ज करना होता है तो दूसरे गांव जाकर चार्ज करते हैं. अगर फोन पर बात करनी हो तो पहाड़ पर चढ़ते हैं.

स्कूल जाने के लिए चढ़ना पड़ता है पहाड़ 
इस गांव में स्कूल नहीं है. यहां के दर्जन भर बच्चे स्कूल जाने के लिए हर रोज पहाड़ चढ़ते हैं. पहाड़ उतरते हैं ओर दूसरे गांव में पहुंच कर स्कूल जा पाते हैं. अपने भविष्य के लिए यहां बच्चे रोजाना संघर्ष करते हैं. 

गांव में नहीं है अस्पताल और डॉक्टर
गांव में न कोई अस्पताल है और न ही कोई डॉक्टर. अगर कोई बीमार हो जाए तो इलाज के लिए एम्बुलेंस भी नही आ सकती. हालत ये है कि मरीजों को खाट पर लिटाकर दो किमी. पहाड़ी की चढ़ाई कर घाटोली तक लाते हैं. यहां से रामगंजमंडी या कोटा लेकर जाते हैं. ग्रामीणों ने बताया कि इलाज में देरी होने से पिछले एक साल में पांच लोग जान गंवा चुके हैं.