राजस्थान: बघेरों की समस्याओं से बेखबर जिम्मेदार, 8 साल में दो दर्जन की हत्या

प्रदेश में एक ओर जहां बघेरों का कुनबा बढ़ रहा है. वहीं, दूसरी ओर जंगल में भोजन के प्रोपर इंतजाम न होने से बघेरों की आबादी क्षेत्र में लगातार घुसपैठ बढ़ रही है, जोकि इनके लिए खतरनाक साबित हो रही है. 

राजस्थान: बघेरों की समस्याओं से बेखबर जिम्मेदार, 8 साल में दो दर्जन की हत्या
प्रतीकात्मक तस्वीर

दामोदर प्रसाद, जयपुर: प्रदेश में एक ओर जहां बघेरों का कुनबा बढ़ रहा है. वहीं, दूसरी ओर जंगल में भोजन के प्रोपर इंतजाम न होने से बघेरों की आबादी क्षेत्र में लगातार घुसपैठ बढ़ रही है, जोकि इनके लिए खतरनाक साबित हो रही है. जिम्मेदार बघेरों की समस्याओं से बेखबर है. वन विभाग के आंकडे देखे तो राज्य में 8 साल में करीब दो दर्जन बघेरों को लोगों ने घेरकर मार दिया है.

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प्रदेश भर के वन अभयारण्य और जंगलों में बघेरों की आबादी पांच साल में  35 से 40 फीसदी तक बढ़ी है, लेकिन सरकार और अफसर ने इनकी सुरक्षा, प्रवास और भोजन के इंतजाम ढंग से नहीं कर पा रहे है, जो इनके लिए काफी नुकसान दायक साबित हो रही है. क्योंकि यह वर्चस्व  की लड़ाई और भूख-प्यास से व्याकुल होकर आए दिन आबादी इलाके में जा रहे है, जहां या तो इनको मार दिया जाता है या फिर शिकारियों के फंदे में फंस जाते है.अज मेर, बांसवाड़ा, डूंगरपुर, राजसमंद, प्रतापगढ़, उदयपुर समेत कई जिलों में इस तरह की घटनाएं लगातार सामने आ रही है. राजधानी से जुडे जंगल में इस तरह की घटनाएं लगातार सामने आ रही है, जिसे रोकना विभाग के लिए चुनौती साबित हो रहा है. वन विभाग के अफसरों ने कई बार इनको लेकर मंथन भी किए, योजनाएं भी बनाई, लेकिन वो कभी फाइलों से बाहर ही नहीं निकल पाई, जिसका खामियाजा वन्यजीवों को भुगतना पड़ रहा है.

पिछली राज्य सरकार ने वाइल्ड लाइफ कंजर्वेशन और ट्यूरिज्म के रूप शुरू विकसित करने के लिए लेपर्ड प्रोजेक्ट की शुरूआत की. इसमें झालाना, बस्सी सीतामाता, खेतडी बांसिलायल, माउंटआबू और कुंभलगढ(रावली टॉडगढ) अभयारण्य को शामिल किया गया. यहां ग्रासलैंड, चारदीवारी, सुरक्षा, सर्विलांस समेत कई सुविधाएं विकसित करनी थी, लेकिन फंड नहीं मिलने से झालाना के अलावा कहीं भी काम पूरा नहीं हुआ. सरकार ने कोई रूचि भी नहीं दिखाई, जिससे बघेरों के लिए सौगात अधूरी ही रह गई है.

बघेरे के प्रवास से देशभर से ख्याति पा चुके झालाना जंगल में भी आए दिन बघेरे बेघर हो रहे है. यहां वर्चस्व की लडाई और भोजन की कमी है, जिससे आए दिन यहां से बघेरे जंगल से आबादी इलाकों में जा रहे हैं. 20 वर्ग किलोमीटर के इस जंगल में 30 बघेरे प्रवास कर रहे हैं. इस ओर भी जिम्मेदारों का ध्यान नहीं है.

- प्रदेश भर में 600 से ज्यादा बघेरे हैं.
- 250 से ज्यादा सेंचुरी तो 300 से ज्यादा जंगल में कर रहे प्रवास.
- बीते 5 साल में 35 से 40 फीसदी बढी संख्या.
- वाहन की टक्कर, करंट या फंदा लगने, आपसी टकराव, लोगों ने घेरकर मारने, शिकार सहित कई वजह से बीते 8 साल में 300 से ज्यादा बघेरों की मौत हुई हैं.

वन विभाग के अधिकारियों भी मानते है कि बघेरों को जंगल में पर्याप्त भोजन नहीं मिलने के कारण एक जंगल से दूसरे जंगल और बाहरी आबादी एरिया में भी घुसपैठ कर रहे है, जिन संरक्षिक क्षेत्रों में खाने का अभाव है उनमें वनस्पति का विभाग की ओर से सुधार किया जा रहा.जं गल में अरबी घोस की संख्या बढेगी खाना ज्यादा मिलेगा.मा नव के साथ रहने वाले पालतु जीव का शिकार पैंथर के लिए आसान शिकार होता है.जं गल में एक हिरण को पकडना पालतू कुत्तों को पकडना भेड बकरी को पकडना आसान नहीं होता है.खुद  अधिकारी भी मानते है कि जंगल में पर्याप्त भोजन नहीं होने से बघेरे बाहर आ रहे हैं. विभाग की ओर से समय समय वित्तिय संसाधन उपलब्ध होते है तो व्यवस्थाएं की जाती है. जल्द ही वन विभाग अन्य स्थानों पर भी पैंथर प्रोजेक्ट तैयार कर देंगे.

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