झुंझुनूं में महिलाओं की किटी से कट्टी, आध्यात्म और संस्कृति का बिखेर रहीं ज्ञान

अब श्री श्याम सखी दरबार ने इस आध्यात्म और संस्कृति के कार्यक्रम में बच्चों को भी जोड़ दिया है. अक्सर बच्चे लैपटॉप, टीवी, कंप्यूटर और मोबाइल में लगे रहते हैं. 

झुंझुनूं में महिलाओं की किटी से कट्टी, आध्यात्म और संस्कृति का बिखेर रहीं ज्ञान
अब श्री श्याम सखी दरबार ने इस आध्यात्म और संस्कृति के कार्यक्रम में बच्चों को भी जोड़ दिया है.

संदीप केडिया, झुंझुनूं: आज के दौर में महिलाएं किटी पार्टी के जरिए बाहर निकलना और अपनी सहेलियों से मिलने का सोचती हैं लेकिन झुंझुनूं के चिड़ावा में एक महिलाओं का ऐसा ग्रुप भी है, जिन्होंने न केवल किटी से कट्टी कर ली है बल्कि आध्यात्म को अपनाने के साथ बच्चों को भी डोरेमोन की जगह भगवान के जीवन से रूबरू करवा रही हैं.

झुंझुनूं के चिड़ावा की महिलाओं ने दो साल पहले अपना श्री श्याम सखी दरबार बनाया था. ये सखियां हर महीने न केवल आपस में मिलती है बल्कि भारतीय संस्कृति और हिंदू धर्म के मुताबिक सभी त्यौहारों को भी सनातन परंपरा के मुताबिक ही मनाती भी हैं.

आज के जमाने में जहां हर कोई आध्यात्म से दूर जाते हुए आधुनिक जमाने के साथ चलने में ज्यादा दिलचस्पी दिखाता है, वहीं, महिलाओं ने अपना दान-पुण्य का भी अलग से फंड बना रखा है. इसे वे इकट्ठा कर एक साथ बड़ी चैरिटी करती है. दरबार की संयोजिका रेखा संदीप हिम्मतरामका का मानना है कि हमारे त्यौहारों को जिंदा रखना है तो इसे पुरानी परंपराओं के हिसाब से भी मनाना पड़ेगा और ईश्वर की शक्ति को मानते हुए उनसे जुड़े रहना होगा.

श्री श्याम सखी दरबार की सोच भी कम फिल्मी नहीं है. दरबार की संयोजिका रेखा संदीप हिम्मतरामका बताती है कि वह अपनी जेठानी के साथ ऐसे ही बैठी थी तब ख्याल आया कि महिलाओं का ग्रुप बनाया जाए लेकिन ग्रुप के साथ ही मिलने जुलने के लिए किटी पार्टी भी याद आई लेकिन उन्हें अपने पीहर और ससुराल में आध्यात्म, संस्कृति और सहयोग के संस्कार मिले थे. 

यही कारण है कि उन्होंने श्री श्याम सखी दरबार की कल्पना की और 13 महिलाओं से दो साल पहले शुरू हुआ सफर अब 40 महिलाओं तक पहुंच गया है. इनका दावा है कि दो साल में जो भी महिलाएं उनसे जुड़ी है. उनमें काफी बदलाव देखने को आया है. सबसे खास बात है कि आत्मविश्वास और सकारात्मक में इजाफा हुआ है.

बच्चों को भी जोड़ा जा रहा
अब श्री श्याम सखी दरबार ने इस आध्यात्म और संस्कृति के कार्यक्रम में बच्चों को भी जोड़ दिया है. अक्सर बच्चे लैपटॉप, टीवी, कंप्यूटर और मोबाइल में लगे रहते हैं. आउटडोर गेम्स न के बराबर हो गए हैं. वहीं डोरेमोन, सिंचन, नोबिता से ज्यादा कुछ जानते नहीं है. इसलिए उन्हें धर्म से जुड़े हर एक ईश्वर के बारे में बताना, उनकी कहानियां सुनाना और साथ ही साथ लेखन में भगवान का नाम लिखवाना समेत ऐसे कई कार्यक्रम करने की शुरूआत की है ताकि बच्चे हमारी धर्म और संस्कृति को जानें. वहीं उनमें भी वो आत्मविश्वास और सकारात्मकता आए, जो महिलाओं में आई है, जिससे उनका भविष्य सुधर सके.

किटी को किया कट्टी
आज के समय में न केवल महिलाओं और बच्चों में, बल्कि हर एक व्यक्ति आधुनिक परिवेश में ढलना चाहता है. पर झुंझुनूं की चिड़ावा में रहने वाली इन महिलाओं ने धर्म और संस्कृति को जीवित रखने और आने वाली पीढ़ी को भी किताबी शिक्षा के साथ-साथ संस्कारवान बनाने के लिए जो बीड़ा उठाया है, वो काबिले तारीफ है. यही कारण है कि बीते दो सालों में क्षेत्र में महिलाओं में बदलाव आया है और वे किटी पार्टी को कट्टी कर आध्यात्म को अपनाने के बाद खुश हैं.