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Rajsamand News: राजस्थान के राजसमंद जिले के ग्रामीण अंचलों में इन दिनों परंपरा, भक्ति और लोक संस्कृति का अनोखा संगम देखने को मिल रहा है. बता दें कि मेवाड़ की पहचान बन चुकी गवरी इन दिनों पूरे क्षेत्र में छाई हुई है.
भील आदिवासी समाज के लोग पारंपरिक वेशभूषा में अपने देवी-देवताओं की गाथाएं नृत्य, गीत और अभिनय के ज़रिये प्रस्तुत कर रहे हैं. आपको बता दें कि हर वर्ष सावन-भादवे के महीने में करीब 40 दिनों तक चलने वाला यह लोक-नाट्य ''गवरी'', ना सिर्फ मनोरंजन का माध्यम है, बल्कि यह आदिवासी समाज की आस्था, त्याग और सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक भी है.
गवरी का मंचन करने वाले कलाकार इस दौरान अपने घरों से बाहर रहते हैं. वे मांस, शराब, जूते चप्पल और अन्य कई चीजों से परहेज करते हैं और एक तपस्वी की तरह इस धार्मिक परंपरा को निभाते हैं.
राजसमंद जिले के हर गांव में जब गवरी का आयोजन होता है तो सैकड़ों ग्रामीण एकत्रित होते हैं. लोग धार्मिक नाच-गान का आनंद लेते हैं और देवी-देवताओं के स्वरूपों को देख श्रद्धा से नतमस्तक हो जाते हैं. वहीं, गवरी का मंचन करने वाले बताते हैं कि गवरी हमारे लिए सिर्फ नाटक नहीं है, ये हमारी संस्कृति है हमारी आस्था है. हम हर साल इसे पूरे मन से निभाते हैं. राजसमंद और मेवाड़ के अन्य क्षेत्रों में गवरी का यह सांस्कृतिक उत्सव न केवल नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ रहा है बल्कि लोक परंपराओं को भी जीवित रखे हुए है.
गवरी नृत्य, जिसे राई नृत्य के नाम से भी जाना जाता है, राजस्थान के मेवाड़ क्षेत्र में रहने वाली भील जनजाति का एक पारंपरिक नृत्य-नाटिका है, जो मानसून के मौसम में (सावन-भादों माह में) किया जाता है और इसमें शिव-पार्वती से संबंधित पौराणिक कथाओं को दर्शाया जाता है. यह नृत्य 40 दिनों तक चलता है और इसमें केवल पुरुष ही भाग लेते हैं.
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