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Banswara News: दक्षिण राजस्थान के वाग्वर अंचल में शैव धर्म बहुत ही फला और फूला है. इसके उदाहरण है यहां के शिल्प सौदर्य के धनी शिवालय. वागड़ के इन्हीं शिवालयों में पर्यटकों व श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है. संगमेश्वर महादेव मंदिर बांसवाड़ा-डूंगरपुर जिले की सीमा के साथ गुजरात राज्य की सरहद पर तीन नदी अनास, जाखम व माही संगम तट के बीच तलहटी में संगमेश्वर महादेव नामक प्राचीन शिवालय एवं रमणीय तीर्थ स्थल है.
डूंगरपुर जिले के चीखली एवं बांसवाड़ा जिले के आनंदपुरी के मध्य बेडूआ गांव के पास स्थित संगमेश्वर महोदव. बांसवाडा के माही डेम के गेट खुलने के बाद अब जलमग्न हो चुका है. इस शिवालय की अद्भुत कला कभी भी बाढ़ से प्रभावित नही हुई. वागड़ प्रदेश में नदी तट पर बने बड़े-बड़े कई देवालय बाढ़ से क्षतिग्रस्त्र हो चुके है. लेकिन संगमेश्वर मंदिर सुरक्षित ही रहा. वर्तमान में यह शिवालय कड़ाणा बांध निर्मित होने से जरूर प्रभावित हुआ है.
कड़ाणा बांध के बेकवाटर से अति प्राचीन मंदिर वर्षा के दिनों में पानी से डूब जाता है. तथा आठ माह तक यह पूरी तरह से डूबा हुआ रहता है. कड़ाणा बांध के बेकवाटर का जलस्तर जब ४०० फीट से कम होता है. तब यह मंदिर पूरी तरह दर्शनों के लिए खुल जाता है. श्रावण मास में जलस्तर कम होने से पूरे माह श्रद्धालु नावों में बैठकर दर्शन करने जाते है. नैर्सगिंक सौन्दर्य लिए हुए अरावली पर्वतमालाओं की श्रृंखलाओं के बीच दो नदी के संगम मे स्थित शिवालय ईटों व पत्थरों के ऊपर चूने की कलाई से युक्त निर्मित अत्यधिक कलात्मक है.
इस मंदिर के गर्भ में उन्नत शिखर है. गर्भ गृह में आकर्षक सभी मंडप भी है. मुख्य मंदिर मे प्रवेश करने पर सामने स्वयंभू शिवलिंग है. इसके सामने शिव प्रतिमा है. मंदिर के बाहर साधुओं की समाधि के स्मारक बने हुए है. मंदिर के पास सूर्यमुखी मंदिर है.
मंदिर की व्यवस्था नही तट पर रहने वाले नाव संचालक एवं ग्रामीणों के हाथों में है. इस स्थल पर पहुचने के लिए चीखली से तीन किलोमीटर दूरी पर नही तट से पहुचा जाता है. जबकि बांसवाड़ा जिले के आनन्दपुरी से पांच किलोमीटर की दूरी तय कर संगमेश्चर पहुंंचा जाता है.
बारिश नहीं होने पर जल में समाये रहने वाले महादेव मंदिर में दर्शन के लिए श्रद्धालु नाव द्वारा मंदिर पहुचते है. मंदिर के ऊपरे हिस्से में पुजा-अर्चना करते है. सन् १९७० में निकट गुजरात सरकार के द्वारा कड़ाणा बांध बनाये जाने से यह संगम स्थल डूब में गया. यहां पर दोनों मंदिर आधे वर्ष भर पानी में समाये रहते है. इससे मेले का अस्तित्व ही समाप्त हो गया.
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