कोटपुतली की इस कंपनी ने राजस्थान सरकार पर लगाया बड़ा आरोप, ग्रामीण भी धरने पर बैठे

इस सड़क के दोनों ओर दर्जनों गांवों के अलावा देश की सबसे बड़ी सीमेंट फैक्ट्रियों में से एक अल्ट्राटेक का प्लांट भी है.

कोटपुतली की इस कंपनी ने राजस्थान सरकार पर लगाया बड़ा आरोप, ग्रामीण भी धरने पर बैठे
सड़क बनाने वाले सरकार की तरफ इशारा करते हैं.

अमित यादव, कोटपूतली: तहसील में चौलाई-गोवर्धनपुरा सड़क पिछले 5-7 साल से बहुत बुरी हालत में है. बड़े-बड़े गड्ढों के अलावा यहां कुछ नहीं दिखता. इस सड़क के दोनों ओर दर्जनों गांवों के अलावा देश की सबसे बड़ी सीमेंट फैक्ट्रियों में से एक अल्ट्राटेक का प्लांट भी है.

इस सड़क का सबसे ज्यादा इस्तेमाल भी इसी फैक्ट्री में आने और जाने वाले भारी वाहन ही करते हैं. आज से जब 15 साल पहले ये फैक्ट्री लगी थी, तब विकास के बड़े-बड़े सपने दिखाए गए थे, लेकिन अब गांव वालों का कहना है कि उन्हें न इससे रोजगार मिला और न ही कोई विकास हुआ. उनके हिस्से आया तो सिर्फ धूल के उड़ते गुबार, सिलिकोसिस की बीमारी और गिरता भू जल स्तर. अब इस सड़क को बनाने की मांग पर गांव वाले 6 दिन से धरने पर बैठे हैं, लेकिन उनकी सुध न स्थानीय जनप्रतिनिधि ले रहे हैं और न ही अल्ट्राटेक कंपनी.

इस फैक्ट्री से होता है सरकार को मोटा मुनाफा
कोटपूतली तहसील में गांव चौलाई और गोवर्धनपुरा को जोड़ने वाली सड़क पिछले 5-7 साल से बहुत ही खराब हालत मे है. ये सड़क मार्ग एक तरफ सीकर स्टेट हाईवे से जुड़ता है तो दूसरी तरफ दिल्ली से मुबई वाले देश के सबसे बिजी हाईवे यानी NH 48 से जुड़ता है. चौलाई और गोवर्धनपुरा के बीच ही देश के सबसे बड़े सीमेंट प्लांट में से एक प्लांट भी स्थित है जो कि अल्ट्राटेक कंपनी का है. सरकारी खजाने में तगड़ा राजस्व देने वाला इलाका होने के बावजूद गांव वालों को सड़क बनाने के लिए अनशन पर मजबूर होना पड़ रहा है.

सड़कें जीवन का आधार होती हैं, लेकिन चौलाई गोवर्धनपुरा सड़क पर सिवाय गड्ढों के कुछ भी दिखाई नहीं देता है. करीब 10 किलोमीटर के इस रूट पर इतने बड़े-बड़े गड्ढे हैं कि गाड़ियां हिचकोलें खाते चलती हैं. हर वक्त डर बना रहता है. इस सड़क पर चौलाई, गोवर्धनपुरा, कांसली, जोधपुरा, मोहनपुरा जैसे दर्जनों गांव पड़ते हैं, लेकिन न जाने क्यों, कोई भी जिम्मेदार इस सड़क की सुध लेने को तैयार नहीं है. पिछले 5-7 साल से तो इस सड़क की हालत बहुत ही ज्यादा खराब हो गई है. मजबूरन अब गांव वालों को सड़क निर्माण की मांग के लिए अनशन पर बैठना पड़ा रहा है.

सरकार को विकास के लिए दिए जा चुके हैं पैसे
हमने अल्ट्राटेक के प्रतिनिधियों से कैमरे पर आकर बात करने की गुजारिश की, लेकिन वो नहीं आए. हालांकि अल्ट्राटेक का दावा है कि DMFT में उनकी तरफ से 40 करोड़ रुपये से ज्यादा जमा कराए गए हैं. PWD  का भी दावा है कि उन्होंने राज्य सरकार को 9 करोड़ से ज्यादा का प्रस्ताव बनाकर भिजवा दिया है, लेकिन हकीकत क्या है, इसके बारे में स्पष्ट तरीके से कोई भी कुछ नहीं कह पा रहा है.

सवाल उठता है कि इस खस्ता हालत वाली सड़क का गुनहगार कौन है? सड़क का सबसे ज्यादा इस्तेमाल करने वाली कंपनी पैसा देने की बात कहती है. सड़क बनाने वाले सरकार की तरफ इशारा करते हैं और सरकार यानी जनप्रतिनिधि गांव में आकर देखने तक की जहमत नहीं उठाते. क्या इस सड़क का शुभ दिन कभी आएगा?