जयपुर: सरपंच बनने के बाद भी महिलाओं की आजादी अधूरी, पति और ससुर चलाएंगे पंचायत!

पंचायत चुनाव में आधी आबादी भले ही प्रदेश की 5 हजार से ज्यादा ग्राम पंचायतों में चुनाव जीतकर सरपंच बनने की कतार में हैं लेकिन इससे ज्यादा खुशी भावी सरपंच पति, सुसर, जेठ और पुत्र को है.

जयपुर: सरपंच बनने के बाद भी महिलाओं की आजादी अधूरी, पति और ससुर चलाएंगे पंचायत!
ग्राम पंचायतों में महिलाओं की आजादी अभी भी अधूरी है.

जयपुर: 'अंगूठा टेक, रहे न एक' ये नारा लंबे समय से समाज को शिक्षा की अहमियत समझाता आ रहा है. इसके बावजूद पढ़ी-लिखी ग्राम पंचायतें ससुर, जेठ, देवर और पति के आगे ग्राम पंचायतों में महिलाओं की आजादी अभी अधूरी है.

कई पंचायतों में महिलाएं सरपंच बनेंगी लेकिन असल में अधिकांश जगह पंचायतें उनके पति, ससुर या अन्य रिश्तेदार चलाते हुए फिर नजर आएंगे. बैखौफ होकर वे पंचायत कार्यालय में उनकी कुर्सी पर बैठेंगे और हस्ताक्षर भी करेंगे जबकि पंचायतीराज विभाग इसे आपराधिक कृत्य मानता है. ऐसा होने पर आईपीसी में मुकदमा भी दर्ज हो सकता है. इस बार तो शैक्षणिक योग्यता हटने के बाद तो ये सिलसिला ज्यादा देखने को मिलेगा.

पंचायत चुनाव में आधी आबादी भले ही प्रदेश की 5 हजार से ज्यादा ग्राम पंचायतों में चुनाव जीतकर सरपंच बनने की कतार में हैं लेकिन इससे ज्यादा खुशी भावी सरपंच पति, सुसर, जेठ और पुत्र को है.

महिलाओं की आजादी अभी भी अधूरी 
इनके आगे ग्राम पंचायतों में महिलाओं की आजादी अभी भी अधूरी है. गांव की सत्ता में महिलाओं को भले ही 50 फीसदी आरक्षण का लाभ मिला हो लेकिन महिला सरपंच होने के बावजूद सत्ता की "चाभी" उनके के हाथों में नहीं रहकर इन परिवार के "मोट्यार" के हाथ में रहने वाली है. ये बात गांवों की चौपालों पर भावी सरपंच महिलाओ के भावी सरपंच पति, ससुर और पुत्र के साथ उनके जेठ बोल रहे हैं. 

महिला प्रत्याशी को पर्दे के पीछे से सपोर्ट
उनका कहना है कि भावी महिला सरपंच पंचायत के कामकाज के बजाए चूल्हा-चौका के साथ-साथ खेती-बाड़ी संभालेंगी. उनकी जगह उनके पति प्रतिनिधि सरपंच बनकर पंचायती करेंगे. साथ ही सचिव उनके पद का लाभ उठाने में कोई कसर नही छोड़ने वाले हैं. ग्राम पंचायतों में ग्राम सचिव भी ऐसी ही महिला प्रत्याशी को पर्दे के पीछे से सपोर्ट करने में लगे हुए हैं, जो साक्षर नहीं है और पहली बार राजनीति में कदम रख रही है, जिससे गांव की सत्ता चलाने के लिए ग्राम सचिव की पूरी दखल रहे.

परिवार का पूरा दखल 
वहीं भावी सरपंच बनने की दौड़ में कम पढ़ी-लिखी महिलाओं का कहना है कि भले ही सरपंच का साफा उनके सिर पहनाया जाएगा लेकिन गांव की सरकार चलाने में तो परिवार का पूरा दखल रहेगा. उधर पढ़ी लिखी महिलाओ से इस बात को लेकर जी मीडिया ने बात की तो उनका कहना है कि पढ़े लिखे होने का गांव को फायदा मिलेगा. कुर्सी पर बैठने के साथ साथ सभी फैसले वो खुद लेंगी. उनके परिवार में कोई दखल नहीं करेगा.

सरपंचों का कार्यभार उनके पति न संभालें
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पांच साल पहले राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस समारोह में 'पंचपति' राज की संस्कृति की ओर इशारा किया था. उनका मतलब स्पष्ट था कि पंचायती राज संस्थाओं, विशेषकर ग्राम पंचायत में निर्वाचित महिला सरपंचों का कार्यभार उनके पति न संभालें. यह समस्या विकराल रूप धारण करती गई है कि पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं को इस बार 50 प्रतिशत आरक्षण दे दिया है. महिलाओं को यह आरक्षण देने का उद्देश्य उनका राजनीतिक सशक्तीकरण करना था पर इसके बजाय उनके पति या परिवार के पुरुष सदस्यों का सशक्तीकरण हो रहा है. जब सब काम पंचायतों के पति ही देखते हैं तो फिर क्या मतलब है महिलाओं को आरक्षण देने का?

पत्नी का मोहरे के रूप में इस्तेमाल करते 
राजस्थान में 11 हजार से ज्यादा ग्राम पंचायतों जिसमें 50 प्रतिशत पर महिला आरक्षण घोषित हुआ है. यह हाल पिछले ग्राम पंचायत चुनाव में भी था, जिस पर आज भी ग्राम पंचायत में सरपंचपति या प्रतिनिधि कहलाते पति ही हैं. दरअसल, पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं को आरक्षण मिलने के बाद आरक्षित सीट पर पुरुष चुनाव नहीं लड़ सकते. इसलिए वे अक्सर अपनी पत्नी को चुनाव में खड़ा कर देते हैं और जीतने के बाद अपना दबदबा कायम रखते हैं. वे अपनी पत्नी का मोहरे के रूप में इस्तेमाल करते हैं. 

धन की इस आवक पर सरपंचपति की गिद्ध दृष्टि 
पिछले कुछ सालों में केंद्र और राज्य सरकारों ने कई सरकारी योजना लागू की है, जिन पर ग्राम पंचायतों के सहयोग से अमल किया जाता है. इन योजनाओं के लिए केंद्र और राज्य सरकार दोनों से बड़े पैमाने पर निधियां मिलती हैं. सरपंच अपने विवेक के आधार पर विकास कार्य करवा सकता है. धन की इस आवक पर सरपंचपति की गिद्ध दृष्टि रहती है और वे ग्राम सचिव या अन्य अधिकारियों की मिलीभगत से घोटाले-गबन कर बड़ी राशि की बंदरबांट कर लेते हैं.

समाज सुधार आंदोलन के जरिए संभव 
बहरहाल, सरपंचपति राज की संस्कृति की रोकथाम के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण कदम महिलाओं के प्रति सोच को बदलना है. यह काम बालिका शिक्षा पर जोर देने और समाज सुधार आंदोलन के जरिए संभव है. इसके अलावा एक और उपयोगी सुझाव यह हो सकता है कि उन ग्राम पंचायतों में सचिव पद पर महिला की तैनाती की जाए, जहां महिला सरपंच हैं. इससे महिला सरपंच अधिक सहज होकर काम कर सकेंगी. चुनावों में महिला सरपंचों की शैक्षणिक योग्यता खत्म करना सरपंचपति संस्कृति को बढ़ावा देने का सबसे बड़ा कारण माना जा रहा. 

लगाकर तस्दीक करने वाली महिला सरपंचों से पंचायतों के जटिल वित्तीय कामकाज में औसत कुशलता की भी अपेक्षा नहीं की जा सकती. जब तक निर्वाचित महिला सरपंच खुद स्वतंत्र तरीके से पंचायतों की जिम्मेदारी नहीं संभालतीं, तब तक महिलाओं के राजनीतिक सशक्तीकरण का सपना साकार नहीं हो सकता.