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लोकतंत्र के मंदिर में आदिवासियों की आवाज बनना चाहते हैं राज्य के सबसे युवा विधायक राजकुमार रोत

आदिवासी अधिकारों के लिए लड़ने वाले राजकुमार रोत ने डूंगरपुर जिले की चौरासी विधानसभा सीट पर तत्कालीन राज्यमंत्री सुशील कटारा को 12,934 मतों से हराया है. 

लोकतंत्र के मंदिर में आदिवासियों की आवाज बनना चाहते हैं राज्य के सबसे युवा विधायक राजकुमार रोत
राजस्थान के सबसे कम उम्र के विधायक राजकुमार रोत अब विधानसभा आदिवासी मुद्दों की आवाज बनाने की बात कहते हैं.

अखिलेश शर्मा, डूंगरपुर: छब्बीस साल के राजकुमार रोत के लिए बीते कुछ दिनों के अंदर उसके जीवन की दशा और दिशा बदल गई. कहां तो वह डूंगरपुर के जंगली इलाकों में आदिवासियों के अधिकारों की अलख जगाने घूमा करते थे और कहां अब राजस्थान के सबसे युवा विधायक के रूप में शपथ लेने की तैयारी कर रहे हैं. अब उन्हें पुलिस सब इंस्पेक्टर भर्ती परीक्षा के परिणाम का इंतजार नहीं है, बल्कि वह लोकतंत्र का मंदिर कहलाने वाली विधानसभा में आदिवासियों की आवाज बनना चाहते हैं. 

राजकुमार रोत ने डूंगरपुर जिले की चौरासी विधानसभा सीट पर तत्कालीन राज्यमंत्री सुशील कटारा को 12,934 मतों से हराया है. रोत जी मीडिया से बातचीत में कहते हैं कि राजनीतिक दलों ने आदिवासियों के वास्तविक मुद्दों की कभी गंभीरता से परवाह नहीं की. उनकी समस्याएं तथा मूलभूत जरूरतें जस की तस हैं. इसीलिए उन्होंने राजनीति में उतरने का फैसला किया और अपने तमाम तीर और तलवार के साथ चुनावी रण में कूद पड़े.

रोत का गांव खांखर खुणिया, जिला मुख्यालय डूंगरपुर से 25 किलोमीटर की दूरी पर है. इसमें 20 किलोमीटर तक तो सड़क है और साधन भी, लेकिन उसके बाद जंगलों में बनी पगडंडी ही सहारा है. वह 2014-15 में डूंगरपुर कालेज के अध्यक्ष रहे.बीए बीएड हैं.इसी साल राजस्थान प्रशासनिक सेवा (आरएसएस) में बैठे और पुलिस सब इंस्पेक्टर भर्ती परीक्षा के परिणाम का इंतजार करते हुए अपने साथियों के साथ दूरदराज के आदिवासी बहुल इलाकों में जल, जंगल जमीन के मुददे पर अलग जगा रहे थे.

लगभग तीन महीने पहले राज्य में जब चुनावी सुगबुगाहट शुरू हुई तो भारतीय ट्राइबल पार्टी (बीटीपी) ने इस इलाके में प्रत्याशी उतारने का फैसला किया. पार्टी ने कुल मिलाकर 11 उम्मीदवार तय किए जिनमें से दो जीते. रोत के अलावा सागवाड़ा सीट पर बीटीपी के रामप्रसाद ने भाजपा के ही शंकरलाल को 4582 मतों से हराया.इस तरह बीटीपी ने राज्य के राजनीतिक पटल पर दस्तक दी है. 


 

दो बहनों के इकलौते भाई रोत के पिता का निधन बहुत पहले हो गया था.उनकी बड़ी बहन सरकारी सेवा में हैं और वही उनकी प्रेरणा स्रोत रही हैं. रोत भील विद्यार्थी मोर्चा से जुड़े रहे हैं और अपनी बाइक से आसपास के सारे आदिवासी बहुल इलाकों की खाक छान चुके हैं. सीधा सरल व्यक्तित्व और अपनाइयत से भरी आवाज में आम लोगों से सीधे संवाद करने वाले रोत ने धीरे धीरे मतदाताओं में अपनी पैठ बना ली और उसी का नतीजा था कि एक कद्दावर राज्यमंत्री के सामने ‘राजनीति के इस रूंगरूट’ को 64119 मत मिले और वह 12,934 वोटों से जीत गए.

बेहद निर्धन परिवार से आने वाले रोत के पिता का 1991 में ही बीमारी से मौत हो गई थी. मेहनत मजदूरी करके राजकुमार रोत को पालने वाली उनकी मां पार्वती ने गरीबी की छाया राजकुमार पर कभी भी नहीं पड़ने दी और गांव से पढ़ाई पूरी करा मां ने राजकुमार रोत को पढ़ने के लिए जिला मुख्यालय स्थित एसबीपी कॉलेज तक भी भेजा. हालांकि राजकुमार रोत का राजनीति में जाने का कोई मन नही था और राजकुमार रोत अध्यापक बनकर मां की सेवा करना चाहता था, इसलिए राजकुमार रोत ने बीएड़ भी कर ली थी, लेकिन उनकी नियति ने उन्हें समाजसेवा के लिए खड़ा कर दिया. 

जी मीडिया से बातचीत में राजकुमार रोत इससे जुड़ा एक किस्सा सुनाते हैं. वो बताते हैं कि अपने गांव में कच्चे रास्ते को पक्का करने के लिए वे लगातार सरपंच, विधायक और सांसद से मिलकर मदद की गुहार लगाते रहें. लेकिन राजकुमार रोत की जब किसी ने नहीं सुनी तो गांव वालों के साथ मिलकर  खुद ही कुदाली फावड़ी लेकर सड़क बनाने मैदान में उतर गए. इस दौरान उन्होंने ग्रामीणों के साथ मिलकर पैसे भी इकट्ठा किया. अपनी इच्छा शक्ति से उन्होंने 15-20 दिनों की मेहनत करके राजकुमार रोत की अगुवाई में डेढ़ किलो मीटर की सड़क को बना दिया.

रोत ने मीडिया से कहा, ‘‘आदिवासियों के लिए सबसे बड़ा मुद्दा संविधान की पांचवी अनुसूची का सही कार्यान्यन नहीं होना है.’’ रोत के अनुसार, इसी कारण आदिवासी आज तक पिछड़े हैं और अपने ही जल, जंगल व जमीन से बेदखल होकर समाज के हाशिए पर पड़े हैं.

रोत के अनुसार अब, विधायक बनने के बाद उनके लिए अपनी सरकारी नौकरी और करियर से ज्यादा महत्वपूर्ण यह हो गया है कि वह विधानसभा में लाखों लाख आदिवासियों की आवाज बनें और ऐसी आवाज बनें जिसकी अनदेखी नहीं की जा सके.