राजीव हत्याकांड : तमिलनाडु ने कांग्रेस नीत संप्रग सरकार पर लगाया आरोप

राजीव गांधी हत्याकांड के दोषियों को रिहा करने के फैसले को ‘राजनीतिक और मनमाना’ करार देने वाले आरोपों को निराधार बताते हुये तमिलनाडु सरकार ने मंगलवार को उच्चतम न्यायालय में जानना चाहा कि केन्द्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार ने उनकी दया याचिकाओं पर फैसला लेने में विलंब क्यों किया जिसकी वजह से उनकी मौत की सजा को उम्र कैद में तब्दील कर दिया गया।

राजीव हत्याकांड : तमिलनाडु ने कांग्रेस नीत संप्रग सरकार पर लगाया आरोप

नई दिल्ली : राजीव गांधी हत्याकांड के दोषियों को रिहा करने के फैसले को ‘राजनीतिक और मनमाना’ करार देने वाले आरोपों को निराधार बताते हुये तमिलनाडु सरकार ने मंगलवार को उच्चतम न्यायालय में जानना चाहा कि केन्द्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार ने उनकी दया याचिकाओं पर फैसला लेने में विलंब क्यों किया जिसकी वजह से उनकी मौत की सजा को उम्र कैद में तब्दील कर दिया गया।

प्रधान न्यायाधीश एच एल दत्तू की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ के समक्ष तमिलनाडु सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने कहा, ‘संप्रग-एक और संप्रग-दो ने अपने दस साल के शासन में राजीव गांधी के हत्यारों को फांसी क्यों नहीं दी।’ संविधान पीठ राजीव गांधी हत्याकांड के सातों दोषियों की उम्र कैद की सजा माफ कर उन्हें रिहा करने के तमिलनाडु सरकार के फैसले के खिलाफ केन्द्र की याचिका की विचारणीयता पर सुनवाई कर रही है। संविधान पीठ के अन्य सदस्यों में न्यायमूर्ति एफएमआई कलीफुल्ला, न्यायमूर्ति पिनाकी चंद्र घोष, न्यायमूर्ति अभय मनोहर सप्रे और न्यायमूर्ति उदय यू ललित शामिल हैं।

राकेश द्विवेदी ने कहा कि तमिलनाडु सरकार पर यह गलत आरोप लगाया जा रहा है कि इस मामले में उसने ‘मनमाना और राजनीतिक’ फैसला लिया। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार पर इस मामले में राजनीतिक फैसला लेने का आरोप लगाया जा रहा है।

वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा, ‘राजनीति गंदा शब्द नहीं है। आज सभी राजनीतिक दलों ने कहा कि उन्हें फांसी मत दो। जनता, सारे विधायक, विपक्ष भी फांसी देने के विरूद्ध था। इस तथ्य को कैसे नजरअंदाज किया जा सकता है कि विपक्ष से किसी ने भी इस पर आपत्ति नहीं की।’ उन्होंने कहा कि केन्द्र सरकार ने 2000 से 2012 के दौरान फैसला नहीं लिया और अब राज्य सरकार पर मनमाने तरीके से काम करने आरोप लगाया जा रहा है।

द्विवेदी ने कहा, ‘आपने उन्हें सुना, दया याचिकाओं पर विचार किया और आपने उन्हें फांसी नहीं दी। उस समय आप कृपालु हैं। जब हम यही करते हैं तो यह मनमाना हो जाता है।’ शीर्ष अदालत ने 28 जून को राजीव गांधी हत्याकांड के तीन मुजरिमों की मौत की सजा को उम्र कैद में तब्दील करने के न्यायालय के फैसले के खिलाफ केन्द्र सरकार की सुधारात्मक याचिका अस्वीकार कर दी थी। न्यायालय ने संतन, मुरूगन और पेरारिवलन की दया याचिकाओं के निबटारे में 11 साल का विलंब होने के आधार उनकी मौत की सजा को उम्र कैद में तब्दील करने के फैसले को लेकर दायर पुनर्विचार याचिकायें भी पिछले साल फरवरी में खारिज कर दी थीं।

राजीव गांधी की 21 मई, 1991 को तमिलनाडु के श्रीपेरम्बदूर में हुयी हत्या के दोषी ये तीनों मुजरिम इस समय वेल्लोर जेल में बंद हैं।

दिन भर की सुनवाई के दौरान द्विवेदी ने कहा कि मामले की परिस्थितियों और तथ्यों में बदलाव के परिप्रेक्ष्य में राज्य सरकार को इस पर विचार करने का अधिकार है।

द्विवेदी ने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री की हत्या ‘क्रूर’ कृत्य था लेकिन 25 साल बाद दोषियों की उम्र, स्वास्थ्य और दूसरे तथ्यों पर विचार करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा, ‘यह नहीं कहा जा सकता कि उम्र (कैद) का मतलब उम्मीद की किसी रोशनी के बगैर ही पूरी उम्र है।’ न्यायालय इस मामले में कल फिर सुनवाई करेगा।

इससे पहले, केन्द्र ने कहा था कि राजीव गांधी के हत्यारों के प्रति किसी प्रकार की दया नहीं दिखायी जा सकती क्योंकि यह हत्या एक साजिश का परिणाम थी जिसमें विदेशी नागरिक शामिल थे।

इस हत्याकांड के सात दोषियों में वी श्रीहरिहरण उर्फ मुरूगन, संतन, राबर्ट पायस और जय कुमार श्रीलंका के नागरिक हैं जबकि महिला मुजरिम नलिनी, रवीचन्द्रन और अरिवू भारतीय हैं।

न्यायालय ने पिछले साल 20 फरवरी को तत्कालीन संप्रग सरकार की याचिका पर इस हत्याकांड में मौत की सजा को उम्र कैद में तब्दील करने का लाभ पाने वाले तीन मुजरिमों मुरूगन, संतन और अरिवु की सजा माफ करने और उन्हें रिहा करने के राज्य सरकार के फैसले पर रोक लगा दी थी।

न्यायालय ने बाद में नलिनी, राबर्ट पायस, जयकुमार और रवीचन्द्रन को रिहा करने के फैसले पर यह कहते हुये रोक लगा दी थी कि राज्य सरकार के इस फैसले में प्रक्रियात्मक खामियां हैं।