ओडिशा में बीजू जनता दल, महाराष्ट्र में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और शिवसेना, दिल्ली में आम आदमी पार्टी तो तमिलनाडु में डीएमके और अन्ना डीएमके के बाद अब पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की हार ने कांग्रेस के नेताओं में सक्रियता भर दी है. यूपी में सपा और बसपा बिहार में राष्ट्रीय जनता दल और जनता दल यू की हालत कोई बहुत अच्छी नहीं है.
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तमिलनाडु, असम, पश्चिम बंगाल और पुडुचेरी के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की हुई करारी हार के बावजूद कांग्रेसी नेताओं के बीच खुशी की लहर क्यों दौड़ रही है? उसकी वजह भाजपा की प्रचंड जीत नहीं है. इसका कारण एक के बाद एक राज्यों में उन क्षेत्रीय दलों की हार है जिनका जन्म कांग्रेस विरोध के नाम पर हुआ था और जो कांग्रेस का वोट बैंक खींच ले गए थे. अब कांग्रेस नेताओं का मानना है कि इन क्षेत्रीय दलों की हार की वजह से आज नहीं तो कल उसका वोट बैंक उसे वापस मिलेगा और उसके पुनर्जीवन की राह प्रशस्त करेगा.
ओडिशा में बीजू जनता दल, महाराष्ट्र में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और शिवसेना, दिल्ली में आम आदमी पार्टी तो तमिलनाडु में डीएमके और अन्ना डीएमके के बाद अब पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की हार ने कांग्रेस के नेताओं में सक्रियता भर दी है. यही नहीं उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी, बिहार में राष्ट्रीय जनता दल और जनता दल यू की हालत कोई बहुत अच्छी नहीं है. मजे की बात यह है कि इन पार्टियों के खराब प्रदर्शन से लाभ कांग्रेस को नहीं बल्कि भाजपा को हुआ है. अधिकतर राज्यों में उसके क्षेत्रीय पार्टियों के साथ तालमेल किया खुद का विकास किया और आखिर में क्षेत्रीय पार्टी को झटका देकर खुद की सरकार बना ली.
1966 में स्थापित शिवसेना ने 1996 में भाजपा का साथ पकड़ा. दो वर्षों बाद बड़े भाई और छोटे भाई की जोड़ी ने राज्य में सरकार बनाई. लेकिन नरेंद्र मोदी के उभार के साथ समीकरण बदल गए. पहले दोनों अलग-अलग लड़े, फिर साथ आए और आखिर में भाइयों की भूमिका बदल गई. भाजपा अकेले दम सबसे बड़ी पार्टी बन गई और शिवसेना को छोटे भाई की भूमिका निभाना मंजूर नहीं था इसलिए उसने अलग रास्ते पकड़ लिए. 1996 में ही भाजपा का साथ देने वाली एक अन्य पार्टी थी अकाली दल. वर्षों तक दोनों की मिलीजुली सरकार चलती रही. भाजपा हमेशा जूनियर पार्टनर की भूमिका में थी. लेकिन अब दोनों की राहें अलग हो चुकी है.
इसी तरह 1998-99 में भाजपा का साथ देने आई पार्टियों में से बीजू जनता दल, तृणमूल कांग्रेस, लोक जनशक्ति पार्टी, डीएमके, अन्ना डीएमके, केरल कांग्रेस, तेलुगु देशम पार्टी, जम्मू कश्मीर नेशनल कांफ्रेंस, इंडियन नेशनल लोक दल, राष्ट्रीय लोक दल जैसी पार्टियां उस समय भले ही अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में भागीदारी कर रही हों, लेकिन राज्यों में उनका दबदबा कायम था. लेकिन आज उन पार्टियों में से अधिकतर या तो अपना अस्तित्व खो चुकी है या अस्तित्वहीन बनकर विपक्ष में बैठी है या फिर भाजपा के सामने सरेंडर कर उसकी सरकार में जूनियर पार्टनर बन चुकी है.
इसी तरह आंध्र प्रदेश में वाईएसआर कांग्रेस और तेलंगाना में भारतीय राष्ट्र समिति (बीआरएस) भी अच्छी हालत में नहीं है. दोनों के शीर्ष परिवारों में फूट है और अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही हैं. यूं कहने को उत्तर से दक्षिण तक और पूर्व से पश्चिम तक देश में भाजपा का परचम फहरा रहा है. अधिकतर राज्यों में या तो भाजपा की सरकार है या उसके सहयोगियों की. केवल हिमाचल और पंजाब जैसे दो-चार अपवाद है लेकिन अगले चुनाव में कांग्रेस को इन पार्टियों के बहुत अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद नहीं है. भाजपा नेता भी इन्हीं राज्यों पर हाथ गड़ाए हैं.
भाजपा महासचिव तरुण चुग ने स्पष्ट कहा है कि बंगाल के बाद अब पार्टी का लक्ष्य पंजाब में अपनी सरकार बनाना है. सिखों के प्रभुत्व वाले इस राज्य में भाजपा हमेशा शिरोमणि अकाली दल की बैसाखी पर चलती रही है. लेकिन अब उसे वह फार्मूला मिल गया है जिससे वह अपने दम पर सरकार बनाने का प्रयास कर सकती है. भाजपा नेताओं का मानना है कि अब लोग अकाली दल कांग्रेस और आम आदमी पार्टी तीनों की सरकारों की नाकामियों से त्रस्त हो चुके हैं. ऐसे में वह एक बार फिर पश्चिम बंगाल का फार्मूला इस्तेमाल कर सकती है. जैसे भाजपा ने बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के ही मजबूत नेताओं को तोड़कर उसका सफाया कर दिया इसी तरह पंजाब में भी पार्टी अकाली दल और कांग्रेस के जमीनी नेताओं को अपने साथ लाने का अभियान चलाने जा रही है ताकि अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में वह एक मजबूत विकल्प पेश कर सके.
आम आदमी पार्टी के साथ राज्यसभा सांसदों को तोड़कर उसने इस अभियान की शुरुआत तो कर ही दी है. तो ऐसे में कांग्रेस का मानना है कि बीजू जनता दल नेता नवीन पटनायक की सेहत ठीक नहीं है और वहां दूसरी पंक्ति का कोई नेता भी नहीं है. इसी तरह ममता बनर्जी के बाद तृणमूल कांग्रेस की संभवत ऐसी ही हालत होगी. नीतीश कुमार की सेहत भी ठीक नहीं है. उनके केंद्र में जाने के बाद जदयू की हालत भी शिवसेना जैसी ही होने वाली है. इन सभी राज्यों में भाजपा के विकल्प के तौर पर कांग्रेस के पुनर्जीवन के अवसर प्रबल हैं. बस थोड़ी सी मेहनत और भाग्य के साथ देने की जरूरत है. क्षेत्रीय दलों के खराब प्रदर्शन से लोगों का रुख एक बार फिर राष्ट्रीय पार्टियों की ओर हो सकता है. और यही उसकी प्रसन्नता की वजह भी है.
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